उच्च न्यायालय ने खाने के बिल पर सेवा शुल्क लगाए जाने के मामले में अपना पक्ष रखने के लिए होटल एवं रेस्तरां मालिकों के एसोसिएशन को दो सप्ताह का समय प्रदान कर दिया। एसोसिएशन ने केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) द्वारा सेवा शुल्क पर रोक लगाने के निर्णय को चुनौती दी थी जिसके जवाब में सीसीपीए ने अपने निर्णय को उपभोक्ताओं के हित में बताया था।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने मामले को नवंबर सुनवाई का निर्देश देते हुए कहा कि सीसीपीए की ओर से दायर हलफनामे का जवाब देने के लिए याचिकाकर्ताओं ने कुछ मोहलत का अनुरोध किया है और इसे स्वीकार करते हुए दो सप्ताह का समय दिया जाता है। अदालत फूड बिल पर सेवा शुल्क लगाने पर रोक संबंधी सीसीपीए के चार जुलाई के दिशानिर्देशों को चुनौती देने वाली नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) और फेडरेशन ऑफ होटल्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन्स ऑफ इंडिया (एफएचआरएआई) की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
एनआरएआई ने उच्च न्यायालय के समक्ष दावा किया है कि चार जुलाई के आदेश के तहत सीसीपीए का प्रतिबंध मनमाना, अस्थिर है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। एनआरएआई की याचिका में कहा गया है कि आतिथ्य उद्योग में सेवा शुल्क की वसूली 80 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही है जो इस तथ्य से स्पष्ट है कि शीर्ष अदालत ने 1964 में इस अवधारणा का संज्ञान लिया था।
केंद्र और सीसीपीए ने उच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी है कि होटल और रेस्तरां खुले तौर पर दिशानिर्देशों की धज्जियां उड़ा रहे है और उपभोक्ताओं से वैसी स्थिति में भी भोजन के बिलों पर सेवा शुल्क अनैच्छिक रूप से वसूल रहे है जब उपभोक्ता भले ही सेवाओं से असंतुष्ट है।