नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने 2014 में दर्ज यौन उत्पीड़न के मामले की जांच पूरी न करने के मामले को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए संबंधित पुलिस उपायुक्त को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा पीड़िता व उसके परिवार की सुरक्षा को खतरा है और आदेश के बावजूद पुलिस ने जांच पूरी नहीं की।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने डीसीपी को अदालत में पेश होकर जांच की सही स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। अदालत एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है।
याची ने अदालत से दिल्ली पुलिस को उसे और उसकी मां की जान का खतरा बताते हुए आरोपियों से सुरक्षा का निर्देश देने का आग्रह किया था। पिछले साल सितंबर में अदालत ने पुलिस के आचरण पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। पुलिस ने नवंबर 20 में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर बताया था कि शिकायतकर्ता महिला घायल हालत में पाई गई थी।
अपने बयान में महिला ने आरोप लगाया था कि उसे और उसकी मां को कुछ लोगों ने पीटा और उसके पैरों पर कुदाल से प्रहार किया। उसने यह भी आरोप लगाया कि एक व्यक्ति ने उसके साथ छेड़छाड़ की और उसे खींच कर कार में डालने का प्रयास किया। पुलिस ने शिकायत पर 323, 341, 506, 509 व धारा 354, 354ए के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।
सुनवाई के दौरान पुलिस स्टेशन रणहौला के एसआई सत्यवीर सिंह ने पेश होकर बताया कि वे मामले में जांच अधिकारी नहीं है। अदालत ने कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्ष 2014 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी और यहां तक कि पुलिस ने भी यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया था कि जांच पूरी हो।
अदालत ने डीसीपी (बाहरी दिल्ली) को सुनवाई की अगली तारीख पर पेश होने का निर्देश दिया है ताकि यह समझा जा सके कि जांच अभी तक पूरी क्यों नहीं हुई है।