नई दिल्ली। एड्स मरीजों में कोरोना संक्रमण के असर पर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। कोरोना संक्रमित होने के बावजूद इस तरह के रोगियों की मृत्युदर बेहद कम 0.025 रही, जबकि दिल्ली में कुल मृत्युदर 1.74 फीसदी है। इस पर चिकित्सक भी हैरान हैं। कोविड-19 का यह व्यवहार चिकित्सकों के लिए अबूझ पहेली बन गया है। ज्यादातर डॉक्टरों का मानना है कि इस पर विस्तृत अध्ययन करने की जरूरत है। इसके बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।
इससे पहले देखा गया है कि कोरोना संक्रमण से उन लोगों को अधिक खतरा होता है जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होते हैं। संक्रमण से हुई मौैतों में इस बात की पुष्टि भी हुई है। हृदय, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी बीमारी वाले मरीजों में कोरोना से मृत्युदर काफी अधिक रही है। पहले माना जा रहा था कि रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म करने देने वाली एड्स जैसी बीमारी से जूझ रहे रोगी को अगर कोरोना होता है तो वह उनके लिए घातक हो सकता है।
अस्पताल की डेथ कमेटी की रिपोर्ट से पता चला है कि एचआइवी का इलाज करा रहे करीब 8000 मरीजों में 4500 कोरोना की चपेट में आए थे। इनमें संक्रमण दर 50 फीसदी के करीब पहुंच गई थी। पीक पर जाने के दौरान पूरी दिल्ली की संक्रमण दर 35 फीसदी तक पहुंची थी। चिकित्सकों का मानना है कि एड्स मरीज आम लोगों की तुलना में ज्यादा संक्रमित हुए, लेकिन वायरस जान लेने तक की घातक स्थिति में नहीं पहुंच सका। दिल्ली की अभी तक की मृत्युदर औसतन 1.74 फीसदी रही है। पीक पर तो यह एक दिन में 10 फीसदी के करीब बनी हुई थी। वहीं, एड्स के मरीजों में आंकड़ा .025 फीसदी ही रहा। कोरोना से सिर्फ दो मौत हुई। कोरोना के इस तरह के व्यवहार पर माना जा रहा है कि इन मरीजों पर महामारी का अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है।
आरएमएल अस्पताल के मेडिसिन विभाग के डॉ. पुलिन कुमार गुप्ता ने बताया कि कोरोना के आने से एड्स के मरीजों पर अधिक खतरा देखा जा रहा था और इनमें ज्यादा मृत्युदर का अंदाजा लगाया जा रहा था। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। इन मरीजों में मृत्युदर बेहद कम रही है। अध्ययन से स्पष्ट है कि कोरोना से जो मृत्युदर एक स्वस्थ आदमी में है, वह एचआइवी मरीजों में भी है। ऐसा नहीं हुआ है कि इन मरीजों मेें मृत्युदर बढ़ गई हो।
डॉ. कुमार के मुताबिक, कोरोना काल में भी एड्स मरीजों के इलाज में कोई बाधा नहीं आई। पहले इन्हें एक माह की दवा दे जाती थी। अब तीन से चार महीने की दवा दी जाती है। उन मरीजों की काउंसलिंग भी होती है, जिससे इन्हें बीमारी के विषय में और स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए पूरी जानकारी मिलती रहे।
यह शोध का विषय : युद्धवीर
अध्ययन पर हैरानी जताते हुए एम्स के क्रिटिकल केयर विभाग के डॉक्टर युद्धवीर सिंह ने कहा कि विस्तृत अध्ययन के बाद ही कोरोना के इस तरह के व्यवहार पर ज्यादा कुछ कहा जा सकता है। अमूमन, कोरोना वायरस व्यक्ति के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर हमला करता है। चूंकि, एड्स के पीड़ित रोगी के शरीर की इम्यूनिटी प्रणाली पहले ही खत्म रहती है। ऐसे में कोरोना वायरस एचआईवी मरीज पर हमला नहीं कर पाता। कुछ अध्ययनों में यह भी पता चला है कि एचआइवी की दवाएं कोरोना पर भी असर कर सकती हैं। हालांकि, इस मामले में स्पष्ट कुछ नहीं कहा जा सकता है। एड्स के मरीजों में कोरोना से मृत्युदर का कम होना शोध का विषय है।
इनमें कम मिली है एंटीबॉडी
एम्स ने पिछले साल एचआइवी मरीजों पर सीरो सर्वे किया था। सर्वे में एचआइवी से ग्रसित 164 मरीज शामिल थे। इनमें से केवल 14 प्रतिशत में कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडी पाई गई। उस समय दिल्ली में जो सीरो सर्वे हुआ था उसमें 25 फीसदी लोगों में एंटीबॉडी मिली थी, जिससे पता चलता है कि आम लोगों की तुलना में एड्स मरीज कम संक्रमित हुए थे। वहीं, एचआइवी रोगियों में कोरोना के बेहद हल्के लक्षण थे। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना से एचआइवी मरीजों में मृत्युदर का न बढ़ना हैरानी की बात है।
30 साल पहले चला था एचआइवी का पता
करीब 30 साल पहले एचआइवी वायरस का पता चला था। इसकी वजह से इंसान में एड्स की बीमारी होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, एड्स से अब तक दुनियाभर में 3.2 करोड़ लोगों की जान जा चुकी है।