भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच एक बार फिर से गठबंधन होना तय है। नवरात्र के दौरान सीट बंटवारे पर बात आगे बढ़ेगी। भाजपा पंजाब में पहले से मजबूत मगर छोटे भाई की भूमिका स्वीकार करेगी। अलग-अलग कमजोर मगर संयुक्त ताकत से पंजाब की तस्वीर बदल सकती है।
पंजाब विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल की छह साल पहले टूटी दोस्ती फिर बहाल होना तय है। नए सिरे से गठबंधन में भाजपा की स्थिति बेशक पहले से मजबूत होगी, मगर उसे फिलहाल छोटे भाई की ही भूमिका निभानी होगी।
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कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, इस पर नवरात्र में नए सिरे से दोनों दलों के बीच बातचीत होगी। भाजपा भी दोनों दलों की संयुक्त ताकत की समझते हुए शिअद से सैद्घांतिक तौर पर बातचीत के लिए तैयार है।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक दोनों दलों का आकलन है कि साथ आने पर कांग्रेस और आप को सत्ता से दूर रखा जा सकता है। अलगाव के बाद दोनों दलों का न सिर्फ राज्य में प्रभाव कम हुआ है, बल्कि इनके लिए सत्ता दूर की कौड़ी है।
बीते लोकसभा चुनाव की बात करें तो दोनों दलों का संयुक्त वोट आप और कांग्रेस से करीब छह लाख अधिक था। क्योंकि इस चुनाव में कांग्रेस और आप को 35-35 लाख जबकि भाजपा को 18 लाख तो अकाली दल को 25 लाख से अधिक वोट मिले थे।
अधिक सीटें हासिल करने की है भाजपा की योजना
गठबंधन तय है, हालांकि भाजपा की योजना अपने हिस्से की सीटों की संख्या बढ़ाने पर है। साल 1996 से 2020 तक जितने चुनाव हुए हैं, उसमें भाजपा को अधिकतम 25 सीटें मिली है। भाजपा इस संख्या को बढ़ा कर 50 तक ले जाना चाहती है।
बातचीत में भाजपा का कहना है कि बीते लोकसभा चुनाव में उसे 23 सीटों पर बढ़त मिली, जबकि अकाली दल को महज 9 सीटों पर बढ़त मिली। शिअद का कहना है कि अलग-अलग लडऩे के बावजूद उसे भाजपा की तुलना में 5 फीसदी अधिक वोट मिले।
इसलिए होगा गठबंधन
दोनों दलों को अंदाजा है कि अलग-अलग चुनाव लड़ने का लाभ आप और कांग्रेस को मिलेगा। भाजपा चाहती है कि अकाली दल अर्धशहरी सीटों पर दावा न जताए, जबकि अकाली दल चाहता है कि भाजपा ज्यादा सीटों की मांग न करे।
चूंकि दोनों दलों को एक दूसरे की जरूरत है, ऐसे में नवरात्र के दौरान होने वाली बातचीत में गठबंधन पर अंतिम निर्णय हो सकता है। वैसे भी दोनों पक्ष चाहते हैं कि समय रहते गठबंधन पर सहमति बने, जिससे दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य बैठाया जा सके।