दिल्ली में निगमों के विलय होने के साथ ही एशिया को दूसरा सबसे बड़ा नगर निगम मिल जाएगा। टोक्यो के बाद दिल्ली नगर निगम का दायरा सबसे ज्यादा होगा। वहीं, एक होने से नगर निगम के अधिकार और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। इससे निगम की कार्यक्षमता बढ़ेगी। उम्मीद है कि सुविधाएं बेहतर होंगी और इसका फायदा आम लोगों को मिलेगा। एशिया में क्षेत्रफल के मामले में टोक्यो नगर निगम सबसे बड़ा स्थानीय निकाय है। इसका क्षेत्रफल 2194.07 वर्ग किमी है।
नगर निगम के आंकड़े बताते हैं कि 10 साल पहले करीब 1,397 वर्ग किमी दायरे में फैला दिल्ली का एक निगम इस मामले में दूसरे स्थान पर था, लेकिन दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्सों में बांटने के बाद अस्तित्व में आए निगमों से क्षेत्रफल के मामले में देश के कई शहर नगर निगमों से बड़े थे। अब तीनों निगमों का विलय होने के बाद अस्तित्व में आने वाला नगर निगम अपना पुराना स्थान प्राप्त कर लेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि एकीकृत नगर निगम को आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि उसके खर्चे कम होंगे और आमदनी अधिक रहेगी। अतिरिक्त स्टाफ की भी जरूरत नहीं होगी। विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे। नागरिक सुविधाओं में भी सुधार होगा, क्योंकि नगर निगम के पास अपने विभागों को चलाने के पर्याप्त अनुभवी और विशेषज्ञ अधिकारी उपलब्ध होंगे। एकीकृत नगर निगम में सभी स्तर पर प्रतिनियुक्ति पर वरिष्ठ अधिकारी ही नियुक्त हो सकेंगे। लिहाजा, विभागों और जोन की कमान वरिष्ठ अधिकारियों के हाथों में होगी।
64 वर्ष में होता चला गया कमजोर
दिल्ली के नगर निगम की उम्र भले ही बढ़ रही है, मगर वह मजबूत होने के बजाय निरंतर कमजोर हो रहा है। गत 64 वर्ष के सफर के दौरान नगर निगम के हाथ से अनेक महत्वपूर्ण अधिकार चले गए हैं। वहीं, उसे विभाजन का भी सामना करना पड़ा। इसके अलावा उस पर नेताओं एवं अधिकारियों का इतना भार बढ़ गया कि उसे उठाने में उसकी कमर टूटती जा रही है। वर्ष 1958 के दौरान 11 स्थानीय निकायों और एक दिल्ली जिला बोर्ड का विलय करके नगर निगम का गठन किया गया था। इस समय नगर निगम के पास बिजली, पानी, डीटीसी, अग्निशमन जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे। पहली से 12वीं तक स्कूली शिक्षा भी नगर निगम ही उपलब्ध कराता था।
जनता के साथ-साथ पशुओं को भी चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए नगर निगम ही अस्पताल खोलता था। वर्ष 1990 तक नगर निगम के महापौर ही एयरपोर्ट पर विदेशी अतिथियों का स्वागत करते थे। वहीं, वर्ष 1997 में नगर निगम का नए सिरे से गठन होने के बाद वह पूरी तरह कमजोर हो गया है। उसके पास पहले की तरह न तो जनता को सुविधा उपलब्ध कराने वाले प्रमुख विभाग रहे और न ही महापौर को पहले वाला सम्मान दिया गया। वर्ष 2011 में नगर निगम को तीन हिस्सों में बांट दिया गया और उसके पास गली-नालियों का निर्माण कराने के साथ-साथ सफाई व्यवस्था का कार्य ही मुख्य तौर पर बचा। इसके अलावा शिक्षा के नाम पर उसके पास प्राथमिक शिक्षा ही बची हुई है और स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए डिस्पेंसरी और कुछ अस्पताल हैं।
नगर निगम में वर्ष 1958 से 67 तक केवल 80 पार्षद होते थे। वर्ष 1967 में पार्षदों की संख्या 100 कर दी गई। 1997 में पार्षदों की संख्या 134 की गई और वर्ष 2007 में संख्या 272 तक पहुंच गई। दूसरी ओर वर्ष 1958 से वर्ष 1990 तक छह व्यक्तियों को पार्षद के तौर पर मनोनीत करने का प्रावधान था और उन्हें जनता की ओर से चुने जाने वाले पार्षदों की भांति पूर्ण अधिकार होते थे। वर्ष 1997 में नगर निगम में 10 व्यक्तियों को पार्षद मनोनीत करने का प्रावधान किया और अभी तक यह व्यवस्था जारी है। उन्हें जनता की ओर से चुने जाने वाले पार्षदों की तरह अधिकार नहीं हैं। तीन नगर निगम बनने के दौरान उनमें 10-10 व्यक्तियों को पार्षद मनोनीत किया गया।
सालाना होगी दो हजार करोड़ रुपये की बचत
केंद्र सरकार के निर्णय के बाद राजधानी के करीब 96 प्रतिशत हिस्से की देखरेख का जिम्मा संभालने वाले नगर निगम को भी राजस्व के मामले में केंद्र एवं दिल्ली सरकार पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। नगर निगम को प्रतिवर्ष करीब 12 हजार करोड़ रुपये राजस्व के तौर पर प्राप्त होने की संभावना रहेगी, जबकि उसका खर्च 10 हजार करोड़ रुपये तक होने का अनुमान है, क्योंकि नगर निगम का मुख्यालय होगा और तमाम विभागों में प्रमुख अधिकारियों के साथ-साथ अन्य अधिकारियों की संख्या कम हो जाएगी। प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों को उनके मूल विभागों में भेज दिया जाएगा। लिहाजा, नगर निगम पर आर्थिक बोझ कम हो जाएगा।
एक नगर निगम बनने के फायदे
- नगर निगम को आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।
- समस्याओं के निवारण के लिए जनता परेशान नहीं होगी।
- विकास कार्यों के लिए फंड की कमी नहीं रहेगी।
- लंबी दूरी की सड़क, गली आदि निर्माण एक साथ हो सकेगा।
- लंबी दूरी के नालों की सफाई का कार्य एक साथ हो सकेगा।
- बरसात के दौरान जलभराव की समस्या कम होगी।
- सभी करों और शुल्कों की दरें एक समान हो जाएंगी।
- पूरी दिल्ली के लिए एक समान नीति एवं योजनाएं बनेंगी।
- सदन समेत सभी समितियों का एजेंडा छापने की दिक्कत नहीं होगी।
- कर्मचारियों को समय पर वेतन मिलना शुरू हो जाएगा।
- सेवानिवृत्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों को पेंशन एवं लाभ की राशि मिल सकेगी।
- अधिकारियों के बीच क्षेत्र में काम कराने में टकराव नहीं रहेगा।
भाजपा को छवि बदलने में मदद मिलेगी
केंद्र सरकार के तीनों नगर निगमों का विलय करने के निर्णय से प्रदेश भाजपा के नेता काफी खुश है। उनका कहना है कि इस कदम से पार्टी को छवि बदलने का मौका मिलेगा और नगर निगम चुनाव में उसके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर नहीं रहेगी। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा कि नगर निगम की वित्तीय स्थिति तीन हिस्सों में बंटने के बाद बिगड़ गई थी और कई समस्याएं पैदा हुई थीं। अब तीनों नगर निगमों को विलय होने पर एकीकृत नगर निगम मजबूत होगा।
राशि की जरूरत, विलय की नहीं : कांग्रेस
दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अनिल कुमार ने कहा कि तीनों नगर निगमों को पर्याप्त राशि की जरूरत है, एकीकरण की नहीं। उन्होंने भाजपा और आप पर निशाना साधते हुए कहा कि दोनों पार्टियों की साजिश के तहत चुनाव की घोषणा के वक्त पर निगम चुनावों को स्थगित कर दिया गया।