बता दें कि अरविंद केजरीवाल ने पिछले विधानसभा चुनाव में जो रणनीति बनाई थी, उस पर कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा भी चारों खाने चित हो गई। अरविंद जानते थे कि उन्हें कांग्रेस से इतना खतरा नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में सारा ध्यान भाजपा पर लगा दिया। अपनी खास रणनीति के तहत उन्होंने सबसे पहले मुख्यमंत्री के पद को लेकर भाजपा को घेरा। इसमें वे पूरी तरह कामयाब रहे। केजरीवाल ने चुनाव से कई माह पहले ही यह कहना शुरू कर दिया कि भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं है।
यह केजरीवाल की पहली रणनीति थी। अपने दूसरे कदम में उन्होंने खुद से भाजपा के कई ऐसे नेताओं का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उछाल दिया, जो भाजपा ने नामित नहीं किए थे। इससे जनता में जबरदस्त उलझन की स्थिति बन गई। दिल्ली की सड़कों पर कभी केजरीवाल के सामने भाजपा के विजेंद्र गुप्ता के पोस्टर लगे मिलते, तो कभी विजय गोयल का चेहरा। इस पोस्टर वार में भाजपा नेता सतीश उपाध्याय और जगदीश मुखी को भी जगह मिली। केजरीवाल ने अपनी जनसभाओं में इन दोनों नेताओं का नाम लेकर इन्हें भाजपा के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बता दिया।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने खास रणनीति तैयार की थी। इसमें दिल्ली भाजपा नेतृत्व के अलावा केंद्र सरकार भी आप के निशाने पर रही। लोगों को बताया गया कि केंद्र में भाजपा की सत्ता होने के बावजूद दिल्ली के लिए कुछ नहीं किया गया।
भाजपा के वे चुनिंदा नेता भी इस अभियान का हिस्सा बन गए, जो सांप्रदायिकता और महिलाओं बाबत दिए गए अपने अटपटे बयानों की वजह से चर्चा में रहे थे। इनमें ज्यादा बच्चे पैदा करना और महिलाओं को जींस न पहनने की सलाह, जैसे बयान शामिल रहे।
बाद में पार्टी के बड़े नेताओं ने उन बयानों का खंडन या उनसे किनारा करना, केजरीवाल और उनके समर्थकों ने यह विरोधभास भी जनता के सामने सिलसिलेवार तरीके से रखा। किरण बेदी को घेरने के लिए आप ने लोगों के सामने कई सवाल रखे। अभियान के जरिए बेदी से पूछा गया कि वे लोगों को बताएं, उन्होंने चुनाव से महज तीन सप्ताह पहले ही भाजपा क्यों ज्वाइन की है। उनके पास सात-आठ माह का समय था। क्या इसमें बेदी की मौकापरस्ती नहीं झलकती है।
वे मुख्यमंत्री बनाए जाने का आश्वासन मिलने के बाद ही भाजपा में आई हैं। इसके बाद उन्होंने अपने लिए सबसे सुरक्षित सीट क्यों चुनी। यदि उन्हें खुद पर भरोसा था, तो वे नई दिल्ली सीट से अरविंद केजरीवाल के खिलाफ चुनाव मैदान में क्यों नहीं उतरीं।
आप ने अपनी विशेष रणनीति के तहत लोगों के सामने यह बात भी रखी कि पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी ने किरण बेदी के सामने मुख्यमंत्री पद की पेशकश की थी। उन्होंने आप के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। आप नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान लोगों से कहा, बेदी को उस वक्त यह भरोसा नहीं था कि आप को दिल्ली में इतनी सीटें मिल जाएंगी। यही वजह थी कि उन्होंने आप में शामिल होने से साफ इंकार कर दिया।
लेकिन अब उन्हें लगा कि केंद्र में भाजपा की सरकार है और ऐसे में वे राजनीतिक फायदा ले सकती हैं। मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की शर्त मानने के बाद ही वे दिल्ली के चुनाव में उतरी हैं। इस अभियान के पोस्टर आटो और दूसरे सभी सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए। सोशल मीडिया पर भी इसका जबरदस्त प्रचार किया गया। इसके अलावा रोड शो और घर द्वार कार्यक्रम के तहत आप वालंटियर्स ने इन तथ्यों को लोगों तक पहुंचाया। लेकिन किरण बेदी चुनाव हार गई और भाजपा ने उन्हें पुदुचेरी का उपराज्यपाल बना दिया।