उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। भारतीय शिक्षा प्रणाली को हमारी संस्कृति पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि किसी बच्चे को प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में दी जाए तो वे उसे आसानी से समझ सकेंगे।
यदि किसी दूसरी भाषा में दी जाती है तो पहले उन्हें भाषा सीखनी होगी और फिर वे समझेंगे। मानव विकास, राष्ट्र निर्माण तथा सतत स्थायी वैश्विक समृद्धि सुनिश्चित करने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रविवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपराष्ट्रपति बोल रहे थे। इस दौरान केंद्रीय शिक्षा और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान व डीयू के कुलपति प्रो. योगेश सिंह भी उपस्थित रहे।
नायडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी का भी जिक्र किया, जिसमें मोदी ने अदालतों में स्थानीय भाषाओं की आवश्यकता के बारे में भी बात की थी। उपराष्ट्रपति ने कहा कि अकेले अदालतें ही क्यों, इसे हर जगह लागू किया जाना चाहिए। स्थानीय भाषा में ही व्यवहार और कार्यवाही का मूल माध्यम होना चाहिए।
हर गजट अधिसूचना और सरकारी आदेश स्थानीय भाषा में होने चाहिए, जिसे आम जनता समझ सके। उन्होंने विश्वविद्यालयों से आग्रह किया कि वे राष्ट्र के सामने मुद्दों के नए समाधान खोजें। शोध और अनुसंधान का मकसद लोगों के जीवन को खुशहाल और सुगम बनाना होना चाहिए। भारत के पास विश्व की सबसे अधिक युवा शक्ति है और हमारी जनशक्ति का उपयोग राष्ट्र निर्माण के लिए किया जाना चाहिए। नई शिक्षा नीति 2020 एक दूरदर्शी नीति है, जो देश के शिक्षा परिदृश्य में आमूल-चूल बदलाव सुनिश्चित करेगी।
हमें रोजगार पैदा करने वाला बनना होगा : प्रधान
समारोह के विशिष्ट अतिथि के तौर पर केंद्रीय शिक्षा और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि पुरातन विश्वविद्यालयों के नाम ही हमारे सामने हैं, लेकिन देश में 100 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके बहुत कम संस्थान हैं, जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय भी एक है।
उन्होंने डीयू को जीवंत विश्वविद्यालय की संज्ञा देते हुए कहा कि हमारी आजादी का इतिहास इस संस्थान से जुड़ा रहा है। शहीद भगत ने एक रात इस संस्थान में गुजारी। महात्मा गांधी इसके सेंट स्टीफंस कालेज में रहे। प्रधान ने कहा कि भविष्य में हमें रोजगार तलाशने वाले नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाले बनना होगा और डीयू का इसमें अहम योगदान होगा।
देश के अमृतकाल में डीयू अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है, जब देश अपनी आजादी के 100 वर्ष मनाएगा तब डीयू अपनी स्थापना के 125 वर्ष मना रहा होगा। अगले 25 वर्षों में डीयू को शोध के क्षेत्र में बहुत कुछ करना होगा। डीयू की सराहना करते हुए कहा कि देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को डीयू ने सबसे पहले अपनाया है और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए एकल प्रवेश परीक्षा को लागू करने में भी पहल की है। उन्होंने देश में नए पाठ्यक्रम के लिए भी डीयू से योगदान का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति भारत की शिक्षा को जड़ों से जोड़ेगी और वैश्विक स्तर पर शिक्षा का भारतीय मॉडल स्थापित करेगी।
दुनिया का प्रतिष्ठित संस्थान बन चुका है डीयू : कुलपति
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने डीयू की स्थापना को लेकर कानूनी प्रक्रियाओं से लेकर इसके 100 वर्षों के स्वर्णिम इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एक मई 1922 को 750 विद्यार्थियों व केवल तीन महाविद्यालयों के साथ शुरू हुआ यह विश्वविद्यालय आज दुनिया का प्रतिष्ठित संस्थान बन चुका है। अब डीयू में छह लाख छह हजार 228 विद्यार्थी, 91 कॉलेज और हजारों शिक्षक हैं। 40 हजार के बजट से शुरू हुआ यह विश्वविद्यालय आज 838 करोड़ से अधिक के बजट पर पहुंच चुका है।
समारोह के दौरान भारतीय डाक विभाग की दिल्ली मंडल की मुख्य पोस्ट मास्टर जनरल मंजु कुमार, डीन ऑफ कॉलेज प्रो. बलराम पाणी, साउथ कैंपस निदेशक प्रो. प्रकाश सिंह, रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता, समारोह समिति की कंवीनर प्रो. नीरा अग्निमित्रा, प्रोक्टर प्रो. रजनी अब्बी समेत अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।