यह है मियावाकी जंगल तकनीक
मियावाकी जंगल तकनीक में हजारों देसी प्रजातियों के पौधों को एक छोटे से क्षेत्र में एक साथ उगाया जाता है। पारंपरिक जंगल की तुलना में मियावाकी जंगल न केवल कई गुना सघन होता है, बल्कि दो से तीन साल में तैयार हो जाता है। इसे खास प्रक्रिया के जरिए उगाया जाता है, ताकि ये हमेशा हरे-भरे रहें। जंगल विकसित करने के खास तरीके को जापान के बॉटेनिस्ट अकीरा मियावाकी ने खोजा था। इसमें पौधों को पहले उसी मिट्टी में नर्सरी में उगाया जाता है, उसे फिर उस जगह लगाया जाता है जहां जंगल को विकसित करना चाहते हैं। इस तरह पौधों को वही मिट्टी मिलेगी जिसमें वह अब तक पनपा है। वन विभाग के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि देश में जिस रूप से वन को विकसित किया जाता है उसमें एक हेक्टेयर में लगभग एक हजार पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन इसमें एक हेक्टेयर में एक हजार से कई अधिक पौधे रोपे जाते हैं।
तंग शहरी स्थानों के लिए विकल्प
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मियावाकी वन पारंपरिक वनों की भूमिका नहीं बदल सकते हैं। उनका अपना अलग महत्व है। यह केवल छोटे, तंग शहरी स्थानों के लिए एक विकल्प है। अरावली जैव विविधता के साइंटिस्ट इंचार्ज डॉ. एम शाह हुसैन ने बताया कि कई देशों में इस तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें पौधे दो फीट से भी कम दूरी पर उगाए जाते हैं और वे सभी सूरज की रोशनी के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसके लिए रखरखाव करना बहुत जरूरी है।
शहरों में मियावाकी जंगल कई समस्याओं के समाधान है। इनका उद्देश्य पर्यावरण और विकास दोनों को संतुलित करना है। यह परियोजना भीड़भाड़ वाले शहरी स्थानों के भीतर घने हरे क्षेत्र भी बनाने में मदद करेगी। इसके के लिए निविदा जारी कर दी गई है। -नवनीत श्रीवास्तव, उप वन संरक्षक, पश्चिमी मंडल