दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ आरोपी को सबक सिखाने के मकसद से कैद की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती। अदालत ने यह टिप्पणी अपहरण के आरोप में करीब दो साल नौ महीने से जेल में बंद एक आरोपी को जमानत देते हुए की।
न्यायमूर्ति विकास महाजन ने कहा कि यह सामान्य बात है कि अपराध की गंभीरता ही जमानत से इनकार करने का एकमात्र मानदंड नहीं है। एक व्यक्ति जिसे दोषी नहीं ठहराया गया है, उसे केवल हिरासत में रखा जाना चाहिए अगर यह आशंका है कि वह फरार हो सकता है या सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है या गवाह को धमकी दे सकता है। केवल इसलिए कि अपराध एक गंभीर प्रकृति का है इसका आधार नहीं हो सकता एक विचाराधीन व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अनिश्चितकाल के लिए कम कर दें। अदालत ने कहा कि चार्जशीट पहले ही दायर की जा चुकी है और याचिकाकर्ता से कोई वसूली करने की आवश्यकता नहीं है, वह सितंबर, 2020 से हिरासत में है।
आरोपियों की जमानत याचिका पर कोर्ट सुनवाई कर रही थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार पीड़िता ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दिया कि उसका अपहरण आरोपी व्यक्ति और उसकी प्रेमिका ने फिरौती के लिए किया था। पीड़िता का आरोप है कि उनके साथ मारपीट भी की गई। उसका मोबाइल फोन भी आरोपी व्यक्ति ने ले लिया था, जिससे फिरौती की मांग करते हुए कॉल और व्हाट्सएप संदेश भेजे गए थे।