प्रदूषण का स्तर बढ़ने से शहर केलोगों की सांस उखड़नी शुरू हो गई हैं। दिवाली के बाद से अचानक सांस और फेफड़ों से संबंधी बीमारी ज्यादा बढ़ गई हैं।
खांसी भी ऐसी हो रही है कि उस पर सामान्य दवाएं काम नहीं कर रही हैं। डाक्टर भी परेशान हैं और दवा कंपनियां भी। खांसी केरोगियों को डाक्टर जहां कई दवाएं मिलाकर दे रहे हैं।
वहीं कंपनियों ने भी एंटीबायोटिक्स और कफ सीरप को मिक्चर (कई दवाओं का कांबीनेशन) के रूप में देना शुरू कर दिया है।
जहरीली हवा का असर शरीर के प्रत्येक अंग पर पड़ता है। इसका सबसे पहला प्रभाव फेफड़ों और सांस नली की बीमारियों के रूप में सामने आता है।
गाजियाबाद चार साल से लगातार प्रदेश का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर है। यही कारण है कि गाजियाबाद में सांस, खांसी और टीबी के रोगियों के संख्या लगातार बढ़ रही है।
खांसी नहीं होगी ठीक
एंटीबायोटिक्स, एंटीएलर्जिक और कफ मिक्चर किसी से भी खांसी और सांस को आराम नहीं मिलेगा। पॉल्यूशन की स्थिति ऐसी है कि इसमें सांस लेने वाले कम से कम स्वस्थ की श्रेणी में नहीं रह सकते। गाजियाबाद सहित एनसीआर के लोगों को मास्क लगाकर चलना चाहिए। पांच साल बाद तो सभी को मास्क लगाना अनिवार्य हो जाएगा। उसके बिना सड़कों पर निकलना संभव ही नहीं होगा। - डा. अजेय अग्रवाल, सीएमओ।
सबसे ज्यादा नुकसान
शहर की हवा में जहरीली गैसों के साथ ही रसायनों में लिपटे धूल-धुआं के कण भी उड़ रहे हैं। इनको एसपीएम कहते हैं। एसपीएम की मात्रा 10 से 60 पार्टिकल प्रति क्यूब मीटर होने चाहिए।
शहर में इनकी मात्रा 240 से 244 पार्टिकल प्रति क्यूब मीटर है। इसी तरह सीओ(कार्बन मोनो आक्साइड), सीओ 2 (कार्बन डाई आक्साइड), एसओ 2 (सल्फर डाई आक्साइड) और एनओ 2 (नोइट्रोजन डज्ञई आक्साइड) की मात्रा मानकों से ज्यादा है।
इनसे संक्रमण इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि दवाएं सामान्यतया काम नहीं करती हैं। इनके कारण व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।