पुराने आरोपों के अवशेषों से किसी व्यक्ति को परेशान नहीं होना चाहिए
गौरव बाजपेई
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने राइट टू फॉरगॉटेन (भुला दिए जाने का अधिकार) पर एक याचिकाकर्ता की याचिका पर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही क्वैश होने के बाद इंटरनेट पर नाम के साथ ऑर्डर उपलब्ध रहना व्यक्ति के निजता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने हाईकोर्ट को संबंधित ऑर्डर में पहचान चिह्न मास्क करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अपने पिछले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दोषमुक्त व्यक्ति को आरोपों के अवशेषों से परेशान नहीं होना चाहिए। सार्वजनिक सूचना के अधिकार और व्यक्ति के निजता के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है। कार्यवाही रद्द होने के बाद इंटरनेट पर जानकारी बनाए रखने का कोई सार्वजनिक हित नहीं रह जाता।
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 16 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है और इसमें ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ भी शामिल है। इंटरनेट के युग में कोई भी जानकारी स्थायी रूप ले लेती है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषमुक्त कर दिए जाने या उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही क्वैश हो जाने के बाद नाम मास्क करने की जरूरत आनुपातिकता और निष्पक्षता के मूल सिद्धांतों से निकलती है। याचिकाकर्ता ने बताया कि 31 दिसंबर 2019 को उनकी पत्नी की असामयिक मृत्यु के बाद दो एफआईआर दर्ज हुई थीं। एक एफआईआर मृतका की बहन की शिकायत पर दर्ज हुई थी, जिसे हाईकोर्ट ने 7 सितंबर 2021 को क्वैश कर दिया। दूसरी एफआईआर भारत नगर पुलिस स्टेशन में मृतौ के पिता की शिकायत पर दर्ज हुई थी, जिसे 13 मई 2021 को समझौते के आधार पर क्वैश किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि ये ऑर्डर इंटरनेट और थर्ड पार्टी पोर्टल्स पर आसानी से उपलब्ध हैं, जिससे उनके नाबालिग बेटे और परिवार के अन्य सदस्यों को अनावश्यक परेशानी हो रही है। एफआईआर क्वैश होने के बाद नाम के आधार पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहना किसी सार्वजनिक हित की सेवा नहीं करता।