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सामने आ गई अनाथ बच्चों की दर्दनाक सच्चाई

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बिहार, बंगाल, असम और अन्य क्षेत्रों से जिले में बड़ी संख्या में बच्चे काम करने के लिए आते हैं। बाल श्रम करते बच्चों के अलावा घरों में बंधक बनाकर रखे गए सैकड़ों बच्चों को छुड़वाया गया है, लेकिन इनके लिए यहां कोई सरकारी बाल आश्रय गृह नहीं है। वहीं, शहर के प्रमुख निजी बाल आश्रय गृह इन बच्चों को आसरा देते हैं लेकिन ये भी फुल हैं। ये अनाथ बच्चे जाएं तो जाएं कहां? पेश है सौम्य मिश्र की रिपोर्ट...
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डीजीपी के आदेश पर शुरू हुए ऑपरेशन स्माइल के संचालन में भी इस कारण खासी दिक्कत हुई थी। नोएडा से मिले बड़ी संख्या में बच्चों को रखने के लिए पूरे जिले में कोई ठिकाना ही नहीं मिल रहा था। निजी आश्रय घर फुल थे। इस पर उन्हें रात 11 बजे मेरठ के आश्रय घर भेजा गया, जहां रात में किसी ने आश्रय स्थल का दरवाजा ही नहीं खोला और बस रात में बच्चों को ले गई नोएडा वापस आ गई।

दस माह में मिले 135 बच्चे
जिले में एक जनवरी 2014 से 31 अक्तूबर तक चाइल्ड लाइन को 135 बच्चे मिले हैं। इनमें बाल श्रम, यौन शोषण, घरों में बंधक बनाकर रखे गए बच्चे और शहर में अलग-अलग जगह लावारिस हालत में मिले शिशु शामिल हैं। पिछले साल करीब 145 बच्चे मिले थे। वहीं, 2011 से अब तक 15 शिशु मिल चुके हैं। चाइल्ड लाइन के मुताबिक, इस साल 10 माह में 114 बच्चों को उनके माता पिता से मिलवा दिया गया है और बाकी को मथुरा के राजकीय शिशु गृह या प्रदेश के अन्य शहरों के सरकारी बाल आश्रय गृह में आसरा दिया गया है।
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निजी बाल आश्रय गृह में क्षमता से अधिक बच्चे

सेक्टर 12 स्थित साईं कृपा, सेक्टर 72, सेक्टर 52 और ग्रेटर नोएडा स्थित उदयन केयर में अक्सर क्षमता से ज्यादा बच्चे रहते हैं। बाल कल्याण समिति इन्हीं दो बाल आश्रय गृह में बच्चों को रखने की अनुमति देता है। हालांकि, ये दोनों निजी केंद्र हैं। यहीं वजह है कि इन्हें सरकार से कोई मदद नहीं मिलती है।

साईं कृपा की प्रमुख अंजना राज गोपाल बताती हैं कि उनके यहां 50 बच्चों को रखने की क्षमता है लेकिन इस समय 60 बच्चे हैं। उदयन केयर की मैनेजिंग ट्रस्टी डॉ. किरन मोदी बताती हैं कि उनके तीनों बाल आश्रय गृह अक्सर फुल रहते हैं।

दंपतियों को नहीं है जानकारी
मंदिर की सीढ़ियों समेत अन्य स्थानों पर मिलने वाले छह साल तक के बच्चों को मथुरा स्थित राजकीय शिशु गृह में रखा जाता है। इसकी वजह जिले में शिशु गृह का नहीं होना है। मथुरा से ही सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी (कारा) के जरिये बच्चों को गोद दिया जाता है।

चाइल्ड लाइन के अधिकारियों का कहना है कि बड़ी संख्या में दंपतियों को इस बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे में वे बच्चों को गोद नहीं ले पाते हैं। जिला अस्पताल प्रशासन और चाइल्ड लाइन ने जिले में गोद लेने का केंद्र खोलने के लिए प्रस्ताव तैयार किया है। सीएमएस डॉ. आरएनपी मिश्र बताया कि जल्द ही प्रस्ताव डीएम को भेजा जाएगा।
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मथुरा शिशु गृह की हालत अच्छी नहीं दिखी

हमारी टीम हाल ही में करीब सात माह की एक अनाथ बच्ची को लेकर मथुरा स्थित सरकारी शिशु गृह में गई थी। टीम ने बताया कि मथुरा शिशु गृह की हालत अच्छी नहीं है। वहां बच्चों की संख्या अधिक है और सुविधाएं न के बराबर। जिले में गोद लेने का केंद्र जल्द खुलना चाहिए। यहां 6 वर्ष तक के अनाथ बच्चों को रखा जा सकता है। छह वर्ष से अधिक और 18 साल तक के बच्चों को बाल आश्रय गृह में रखा जाता है।
- सत्य प्रकाश, कार्यक्रम अधिकारी, चाइल्ड लाइन, गौतमबुद्ध नगर

युवाओं को नहीं मिल पा रहा सरकारी लाभ
18 साल के बाद अनाथ युवकों को बाल आश्रय गृह में नहीं रखा जाता है। इनको जीवन यापन के लिए सरकार की प्रशिक्षण की योजना है। चाइल्ड लाइन के कार्यक्रम अधिकारी सत्यप्रकाश बताते हैं कि इसके लिए सरकार प्रति माह दो हजार रुपये युवाओं को देती है। जिले में सरकारी बाल आश्रय गृह न होने के कारण युवाओं को यह राशि नहीं मिल पाती है। निजी बाल आश्रय गृह अपने स्तर पर उन्हें रोजगार के प्रशिक्षण देते हैं।

सेक्टर 34 में चल रहा है निर्माण
सेक्टर 34 में तीन मंजिला बाल आश्रय गृह और नारी निकेतन का निर्माण किया जा रहा है। प्राधिकरण इसका निर्माण करवा रहा है। दो मंजिल बन गई हैं। इसे पूरा होने में छह से सात माह का समय लगेगा।
संजय कुमार, जिला प्रोबेशन अधिकारी, जिला प्रशासन
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