भाजपा की उलझन
दिल्ली में भाजपा के कोर वोट 32 से 35 फीसदी हैं। शुरुआती दौर में ये वोट असमंजस में थे और पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा थी। हालांकि अमित शाह की आक्रामक प्रचार और शाइन बाग के मुद्दे के तूल पकडने के बाद माना जा रहा है कि भाजपा अपने कोर वोटरों को साधने में सफल रही है। मगर सवाल है कि इससे आगे क्या? क्या इसका असर उन मतदाताओं (फ्लोटिंग वोटर) पर भी पड़ा है जिसने उसे लोकसभा चुनाव में बढ़त दी थी? क्या कांग्रेस राज्य में बेहतर प्रदर्शन की स्थिति में है? अगर ऐसा नहीं है तो वर्ष 2015 की तरह भाजपा विरोधी वोट का आप के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा।
आप की उलझन
अंतिम दौर में केजरीवाल को पार्टी में बौद्घिक ब्रिगेड की कमी खल रही होगी। विवाद और मतभेद के कारण कभी पार्टी को बौद्घिक रूप से मजबूती देने वाले चेहरे मसलन योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, जस्टिस हेगड़े केजरीवाल का साथ छोड़ चुके हैं। खासतौर से शाहीन बाग पर हो रहे हमले का बौद्घिक स्तर पर बचाव करने वाला आप के पास कोई नेता नहीं है। पार्टी के पास केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के अलावा कोई दूसरा चेहरा नहीं है। ऐसे में अगर मुस्लिम मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बनी, झुग्गी और दलित वोट बंट गए तो आप को इसका सीधा खामियाजा भुगतना होगा।
कांग्रेस की उलझन
असरदार चेहरे का अभाव और गांधी परिवार की दिल्ली चुनाव से दूरी से कांग्रेस मजबूत संदेश नहीं दे पा रही। अंतिम समय में राहुल गांधी की रैलियों की चर्चा है। पार्टी ने केजरीवाल को शाइन बाग जाने की चुनौती दे कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की है। इसके बावजूद संदेश यही है कि यहां मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच है।
ये अहम सवाल तय करेंगे जनादेश का रास्ता
- पीएम मोदी की अंतिम रैलियों का क्या पड़ेगा असर?
- शाइन बाग से निशाने पर आई मुस्लिम बिरादरी एकजुट या उलझन में?
- किसी के पक्ष में झुकेंगे या बंटेंगे दलित मतदाता?
- कितना काम आएगा केजरीवाल का विक्टिम कार्ड?
- राहुल की रैलियों से कितना मजबूत हो पाएगी कांग्रेस?