मधुमेह बीमारी के मामले में भारत को विश्व की राजधानी कहा जाता है क्योंकि देश में मधुमेह रोगियों की संख्या सबसे ज्यादा है। विशेषज्ञों के मुताबिक मधुमेह से पीड़ित करीब 40 फीसदी मरीजों को क्रॉनिक किडनी डिसीज (सीकेडी) होने का खतरा रहता है और उच्च रक्त चाप से पीड़ित करीब 20 फीसदी लोगों को किडनी संबंधी बीमारी होने का गंभीर खतरा रहता है। देश की करीब 10 फीसदी आबादी किसी न किसी तरीके से सीकेडी से पीड़ित है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. एस.के.अग्रवाल ने बताया कि मधुमेह पीड़ित रोगियों को सबसे ज्यादा किडनी संबंधी बीमारी का खतरा रहता है।
किडनी संबंधी बीमारी से पीड़ित करीब 15 फीसदी लोग क्रोनो नेफ्रोलॉराइटिस से और 20 फीसदी मरीज उच्च रक्त चाप से पीड़ित होते हैं। यदि इन मरीजों का शुरुआत में ही इलाज शुरू कर दिया जाए तो सीकेडी के 60 से 70 प्रतिशत को बीमारी से बचाया जा सकता है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि वैसे मरीज जिनमें किडनी संबंधी बीमारी का लक्षण न हो उन्हें निरंतर अंतराल पर यूरिन प्रोटीन और ब्लड क्रिएटिन जांच कराते रहना चाहिए।
मरीज बीमारी के चौथे अथवा पांचवें स्टेज में इलाज के लिए पहुंचते हैं
डायबटीज
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वैसे मरीज जिनके परिवार में किडनी संबंधी बीमारी के मरीज हों अथवा जिनकी उम्र 60 वर्ष या इससे अधिक हो उन्हें जांच जरूर करानी चाहिए। जांच नहीं कराने की वजह से ही किडनी बीमारी से पीड़ित ज्यादातर मरीज बीमारी के चौथे अथवा पांचवें स्टेज में इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचते हैं।
एम्स के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. डी. भौमिक ने बताया कि चौथे और पांचवें स्टेज में आने वाले 50 फीसदी से ज्यादा मरीजों को किडनी प्रत्यारोपण अथवा डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है। डायलिसिस निरंतर करानी पड़ती है और महंगी भी होती है, इसलिए मरीज की आर्थिक स्थिति खराब होती चली जाती है।
सीकेडी मरीजों के इलाज में हृदयाघात और ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों से ज्यादा खर्च होता है। डॉ.भौमिक ने बताया कि डायलिसिस कराने के चक्कर में ज्यादातर मरीजों को अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा बेचना पड़ता है।
एम्स और आईसीएमआर मिलकर कर रहे अध्ययन
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एम्स और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) एकसाथ देश में क्रॉनिक किडनी डिसीज के मरीजों की वास्तविक संख्या का अंदाजा लगाने और मरीजों की प्रकृति पर अध्ययन कर रहा है। इस अध्ययन में करीब छह हजार लोगों को शामिल किया गया है।
अध्ययन में दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद, चेन्नई, भोपाल, गोहाटी, कोलकाता और मुंबई को शामिल किया गया है। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि दो वर्ष से यह अध्ययन चल रहा और करीब सवा साल और चलना है।
इसके बाद अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद इस बीमारी के लिए नई पॉलिसी तैयार की जा सकती है।