सूरजकुंड मेला अंतरराष्ट्रीय जरूर हो गया है लेकिन इसकी सेवाएं पहले से निम्न स्तर की होती जा रही हैं। हस्तशिल्प मेले में आए अवार्डी शिल्पी और कलाकारों को जानवर से भी बदतर स्थिति में रखा गया है।
कुछ कलाकारों को तो हॉल में ठहरा दिया गया है। एक-एक हॉल में 30 से 40 लोग तक रह रहे हैं। अधिकारियों के डर से कोई बोल नहीं रहा है। लेकिन जब इंतहा हो गई तो उन्होंने अपनी परेशानी 'अमर उजाला' को बताई।
इसके बाद हमने मेले के पास स्थित टूरिज्म के लेक व्यू हॉल का रविवार रात को जायजा लिया। वहां का दृश्य किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर यात्रियों के सोने का सीन को भी फीका कर रहा था।
वहां कलाकारों को अपना सामान रखने तक की जगह नहीं थी। मथुरा से आए यशभारती सम्मान से सम्मानित मुरारीलाल शर्मा को भी यहीं पर रहने को कहा गया था। लेकिन वह कलाकारों के साथ दिल्ली के एक होटल में चले गए।
गुजरात के डांडिया ग्रुप के केतन का कहना है कि रहने के लिए बहुत निम्न स्तर की व्यवस्था है। जहां सैकड़ों लोग रह रहे हैं वहां सिर्फ तीन टॉयलेट हैं। सुबह इसके लिए लंबी लाइन लग रही है। न तो यहां नहाने धोने का ठीक इंतजाम है और न ही सोने का।
बोन कार्विंग के नेशनल अवार्ड विनर जाकिर हुसैन कहते हैं कि उन्हें पांच किलोमीटर दूर ठहराया गया है।
वीआईपी से कमरे बचें तब तो कलाकारों को मिलें
ज्यादातर कमरों को वीवीआईपी और वीआईपी लोगों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इस बात को लेकर शिल्पियों और कलाकारों में रोष है। लेकिन अपने आकाओं और वीवीआईपी लोगों की आवभगत में जुटे अधिकारियों को उनकी सुनने की फुरसत कहां है।
अमर उजाला ने जब सूरजकुंड मेला के निवास इंजार्ज यूएस भारद्वाज से बात की तो उन्होंने कहा कि मेला में 'हमारे पास जगह की कमी नहीं है। जंगल फॉल और एनएचपीसी के फ्लैटों में जगह खाली है।
असल बात यह है कि कोई भी आर्टिस्ट सूरजकुंड मेला परिसर के आसपास से कहीं जाना नहीं चाहता है। हम अनाउंसमेंट करवाकर कलाकारों से अपील करेंगे कि यदि किसी को दिक्कत है तो वह खाली जगह पर चले जाए। इस बार तो बंचारी वाले भी यहीं रुक गए हैं। जबकि अब तक वे सेक्टर-12 स्थित स्टेडियम में ठहरते थे।