क्या 1 जून से दिल्ली अंधकार में डूब जाएगी? ऐसा इसलिए कहा जा रहा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे बड़ी बिजली बनाने वाली कंपनी, नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) को निर्देश दिया है कि दिल्ली में बिजली बांटने वाली कंपनियों ने अगर पेमेंट नहीं किया तो आप बिजली काट सकते हैं।
रिलायंस अनिल धीरुभाई अंबानी समूह की कंपनियों बीएसईएस यमुना और बीएसईएस राजधानी पर एनटीपीसी के करोड़ों रुपये बकाया हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर ये कंपनियां 31 मई तक एनटीपीसी का बकाया रकम नहीं देती हैं तो आप बिजली देना बंद कर सकती हैं। अगर ऐसा होता है तो दिल्ली अंधेरे में डूब सकती है। गर्मी का मौसम होने की वजह से दिल्लीवालों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
800 करोड़ रुपये का बकाया है एनटीपीसी का
गौरतलब है कि बीते गुरुवार को दिल्ली को बिजली सप्लाई करने वाली एनटीपीसी ने सुप्रीम कोर्ट से बीएसईएस यमुना और राजधानी को की जा रही बिजली की सप्लाई को रेग्युलेट करने की इजाजत मांगी थी।
एनटीपीसी का कहना था कि ये कंपनियां जितनी बिजली दिल्ली में डिस्ट्रीब्यूशन के लिए ले रही हैं, उसके बदले में कम पेमेंट कर रही हैं। इसके जवाब में दोनों कंपनियों का कहना था कि उन्होंने बकाया रकम का बड़ा हिस्सा एनटीपीसी को चुका दिया है और बाकी पैसा सरकार से मिलने के बाद चुकाया जाएगा।
मगर एनटीपीसी के वकील का कहना था कि एक बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट की कंपनियां होने के बावजूद 26 मार्च के बाद से एक पैसे की पेमेंट नहीं कई गई है। एनटीपीसी के मुताबिक कंपनियों पर 800 करोड़ रुपये बकाया है।
कोल इंडिया को पेमेंट देती है एनटीपीसी
कोर्ट में एनटीपीसी के वकील केके वेणुगोपाल का कहना था कि कंपनियों से मिलने वाली पेमेंट का 75 फीसदी हिस्सा कोल इंडिया लिमिटेड को दिया जाता है, जहां से कोयला खरीदा जाता है।
अगर ये दोनों कंपनियां पेमेंट नहीं करती हैं तो एनटीपीसी का बदरपुर प्लांट बिजली पैदा नहीं कर पाएगा। ऐसे में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि वह अपने उस पुराने फैसले को बदल दे, जिसमें दिल्ली को बिना किसी रुकावट के बिजली देने के लिए कहा गया था।
एनटीपीसी चाहती थी कि वह बिजली सप्लाई को कंट्रोल कर सके। अब सुप्रीम कोर्ट ने एनटीपीसी को इन कंपनियों को दी जा रही बिजली को रोकने का अधिकार दे दिया है, बशर्ते ये कंपनियां 31 मई तक बकाया रकम का भुगतान नहीं करती हैं।
टाटा भुगतान कर रही है तो रिलायंस क्यों नहीं?
दिल्ली के तीन बिजली वितरण करने वाली कंपनियों में से तीसरी के बारे में एनटीपीसी के कहना है कि टाटा की बिजली वितरण कंपनी पूरा भुगतान कर रही है, जबकि बीएसईएस की ओर से ही बकाए को चुकाने में देरी हो रही है।
वहीं आगे कोयले की उपलब्धता के आधार की बिजली की आपूर्ति होगी। इस मामले पर दिल्ली सरकार का कहना है कि बीएसईएस की दो कंपनियों पर 4,500 करोड़ रुपये का बकाया है।
बीएसईएस के मुताबिक उन्होंने 600 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। साथ बकाए के भुगतान के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन किया है।
पार्टियां तो और दाम कम करना चाहती हैं
दूसरी ओर डीईआरसी ने कहा है बीएसईएस द्वारा अदालत और उसे सौंपे गए ऑडिटेड अकाउंट में अंतर है। बीएसई में पर्याप्त निवेश नहीं होने से ऑपरेशंस और उधार की क्षमता पर असर पड़ा है।
वहीं इस पूरी गड़बड़ी के लिए बीएसईएस खुद जिम्मेदार है। इसके अलावा पावरग्रिड ने कहा है बीएसईएस के पास 160 करोड़ रुपये का बकाया है और अब तक केवल 4 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। इस मामले में रिलायंस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
दिल्ली में बिजली को लेकर राजनीतिक पार्टियों में भी खूब खींचतान मची हुई है। दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना था कि दिल्ली में बिजली के दाम कम नहीं हो सकते क्योंकि इसके उत्पादन की लागत बढ़ चुकी है। वहीं आम आदमी पार्टी और बीजेपी बिजली के वर्तमान दाम से भी उसे सस्ता करने का दावा कर रही हैं।