साकेत कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त (सीपी) से उनके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा उनके निर्देशों का पालन न करने पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया था। कोर्ट ने कहा कि विशेष आयुक्त को एक या दो बार नहीं, बल्कि 300 से अधिक बार बुलाया गया और इस प्रथा को बदलना होगा।
साकेत कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश मधु जैन ने कहा कि अगर इस तरह की प्रथा को सभी अदालतों द्वारा अपनाया जाता है तो पुलिस अधिकारियों के लिए अपने संबंधित क्षेत्रों में कानून और व्यवस्था बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि वे अपना पूरा समय अदालतों में बिताएंगे। आदेश में कहा गया है न केवल इस प्रथा की निंदा की जानी चाहिए, बल्कि हमें इस प्रथा को रोकना भी चाहिए। मुख्य लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि उन्हें भी संबंधित अदालत द्वारा कई बार बिना किसी गलती के बुलाया गया है।
अदालत विशेष आयुक्त द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि उनके अधिकार क्षेत्र के तहत पुलिस स्टेशन (बदरपुर) से आने वाले प्रत्येक मामले में संबंधित जांच अधिकारी को बुलाने के बजाय अदालत प्रश्नों के समाधान के लिए उसे तलब करती है।अभियोजन साक्ष्य के चरण में दिल्ली उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत एक आपराधिक मामले से निपटने के दौरान मजिस्ट्रेट अदालत ने गवाहों की गैर-उपस्थिति पर नाराजगी व्यक्त की थी।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि इससे अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है और मामलों को स्थगित करना पड़ता है। इसके अलावा कई मामलों में अदालत को उन गवाहों के खिलाफ जमानती और गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ता है, जो इस अदालत के समक्ष अपना आचरण बदलने में विफल रहे हैं और मौखिक और लिखित चेतावनियों के बावजूद पेश नहीं हो रहे हैं।