असम में हुए उग्रवादी हमले में शहीद हुए ऋषिपाल के गांव भोडाकला में गम और गर्व का माहौल है। पूरे गांव को अपने लाडले को खोने का गम है। मगर साथ ही हर किसी को उनकी शहादत पर नाज भी है। लोगों का कहना है कि आज ऋषिपाल ने पूरे गांव का सिर फक्र से ऊंचा कर दिया है।
ऋषिपाल का पार्थिव शरीर सोमवार की सुबह गांव पहुंचेगा। वह 15 कुमांऊ रेजीमेंट में तैनात थे। 19 नवंबर की रात 9:30 बजे राजधानी एक्सप्रेस से अपने घर भोडाकलां आने के लिए टिकट तक बनवा लिया था। श्रीचंद व लीला देवी के पुत्र ऋषिपाल का जन्म 10 जुलाई 1975 को हुआ था।
वह भारतीय सेना में 1997 में भर्ती हुए थे। ऋषिपाल के तीन बच्चे हैं। पूजा उन की बड़ी लड़की है जो 12वीं में पढ़ती है। अतुल 10वीं व ऋषभ पांचवीं कक्षा में पढ़ रहा है। शहीद की पत्नी लक्ष्मी देवी का रो रोकर बुरा हाल है। पूजा से अमर उजाला संवाददाता ने पूछा कि वह क्या बनना चाहती है तो उसने कहा कि वह टीचर बनेगी। जबकि बेटे अतुल का कहना था कि अपने पिता की तरह देश की सेवा करूंगा।
भगवान को यह मंजूर नहीं था
शहीद के भाई प्रेमपाल ने बताया कि उनका भाई 19 नवंबर को एक माह की छुट्टी पर घर आने वाला था। वह घर में ही कुछ और कमरों का निर्माण कराना चाहता था। लगता है कि भगवान को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके बड़े भाई विनयपाल भी भारतीय सेना में 15 राजपूत बटालियन में तैनात थे।
2006 में रिटायर होने के बाद उनका निधन हो गया था। ग्राम सरपंच यजविन्द्र शर्मा गोगली ने कहा कि सरकार ने आतंकवाद पर पूर्णरूप से विराम लगा देना चाहिए। उन्होंने बताया कि शहीद का अंतिम संस्कार बागानाथ आश्रम के निकट किया जाएगा। पंचायती जमीन में शहीद स्मारक भी बनाया जाएगा।