राष्ट्रपति शासन का नाम लेते ही सख्त प्रशासन का अहसास मन में होता है, लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं है। जनता समझ नहीं पा रही है कि समस्या किसे सुनाएं। एमएलए कह रहे हैं कि उनकी सरकार नहीं है। अधिकारी बेपरवाह हैं। उनकी सुन नहीं रहे हैं।
अमर उजाला ने राष्ट्रपति शासन के पांच महीने के अनुभव पर तीनों पार्टी के एमएलए और आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों तथा संविधान विशेषज्ञों से बातचीत की। सभी का मानना है कि सरकार बननी चाहिए।
आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों का दर्द था कि भागीदारी खत्म हो गई। जनप्रतिधियों ने कहा कि प्रोजेक्ट थम गए। अनधिकृत कॉलोनियों के विकास कार्य रुक गए।
सरकार नहीं तो एमएलए से कौन डरता है जी...
यूं तो राष्ट्रपति शासन के दौरान राजधानी की विधानसभा निलंबित है, जिसमें विधायक का पद बना रहता है, सभी शक्तियां कायम रहती हैं। लेकिन यहां के एमएलए खुद को असहाय बता रहे हैं।
कुछ अनुभवी विधायकों का कहना है कि हम तो अधिकारियों से काम करवा भी लेते हैं लेकिन नए विधायकों का बुरा हाल है। भाजपा, कांग्रेस और ‘आप’ विधायकों का कहना है कि सरकार रहती है तो अधिकारी को डर रहता है।
कांग्रेस विधायक चौधरी मतीन अहमद ने कहा कि सरकार होती है तो अधिकारी ज्यादा सुनते हैं। अब अनसुना करते हैं क्योंकि नेता हर बात के लिए उपराज्यपाल से नहीं मिल सकते। अधिकारी बेपरवाह हो गए हैं। जो पुराने एमएलए हैं, वो तो अपना काम निकलवा भी लेते हैं, नए लोगों को दिक्कत ज्यादा है।
अभी यूं ही चल सकता है राष्ट्रपति शासन
दिल्ली में सरकार बनेगी या नहीं? अगर बनेगी तो कब तक? इसे लेकर कोई पार्टी खुलकर कुछ साफ नहीं कर पा रही है। दिल्ली में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम, 1991 की धारा 50 के हिसाब से 16 फरवरी को लगा राष्ट्रपति शासन एक साल तक संसद की अनुमति के बिना चल सकता है।
लोकसभा और दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा बताते हैं कि राज्यों में संविधान की धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगता है, जो 6 महीने के लिए होता है। यहां एक साल तक सदन की अनुमति की जरूरत नहीं है।
लोकसभा-राज्यसभा मंजूरी दे दे तो एक-एक साल के लिए दो बार राष्ट्रपति शासन बढ़ाया भी जा सकता है। हालांकि केन्द्रीय कैबिनेट की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन कभी भी हट सकता है।
नहीं हो पा रहे हैं फैसले
आप विधायक अखिलेशपति त्रिपाठी ने कहा कि सरकार रहती है तो आसानी होती है। वृद्घावस्था पेंशन, अस्पताल के प्रोजेक्ट या अनधिकृत कॉलोनी विकास से जुड़े काम रुक गए हैं। उपराज्यपाल फैसला नहीं ले पाते। एमसीडी को दिल्ली सरकार का बिल्कुल खौफ नहीं है।
वहीं, भाजपा विधायक नरेश गौड़ ने कहा कि सरकार होती है तो निर्णय होता है। अभी उपराज्यपाल अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं। जबकि पब्लिक एमएलए के पास आती है। मुख्य सचिव की नियुक्ति आम आदमी पार्टी ने की है तो बाकी पार्टी के एमएलए की बात नहीं सुनते। बाकी अफसरों का भी यही हाल है।