रेल बजट में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने ट्रेनों की स्पीड बढ़ाने और समय से चलाने की घोषणा तो की, लेकिन उनकी इस घोषणा के पूरा होने के लिए बेहतर ट्रैक का होना भी जरूरी है।
रेलवे के ज्यादातर संसाधन अंग्रेजी हुकूमत के समय के हैं। देश के सबसे व्यस्त दिल्ली-गाजियाबाद-हावड़ा रूट पर ट्रैक की हालत जर्जर है। ऐसे में ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने की घोषणा पर अमल फिलहाल बेमानी है।
बजट पेश होने के बाद ‘अमर उजाला’ ने गाजियाबाद क्षेत्र में ट्रैकों की हालत देखी। कुछ क्षेत्र में तो ट्रैक इतना जर्जर मिला कि ट्रेनों की स्पीड बढ़ाई तो पटरियां उखड़ सकती हैं।
लकड़ी की सपोर्ट से रोक रखा है ट्रैक
गाजियाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-2 का ट्रैक लंबे समय से नहीं बदला गया। ट्रैक इतना जर्जर है कि पेंड्रोल क्लिप तक निकल गए हैं।
अब स्लीपर पर ट्रैक को रोकने के लिए लकड़ी के बड़े टुकड़ों से सपोर्ट देकर रोक रखा है। इस ट्रैक पर 15 किमी प्रति घंटा से ज्यादा पर ट्रेन दौड़ाने की अनुमति नहीं है।
कोटगांव फाटक पर कई ट्रेनें हो चुकीं डिरेल
कोटगांव फाटक ऐसा प्वाइंट हैं, जहां से दिल्ली से आने वाली ट्रेनें देहरादून, मुरादाबाद और कानपुर रूट के लिए अलग-अलग ट्रैक पकड़ती है। इस प्वाइंट पर सबसे ज्यादा दबाव रहता है।
कोटगांव फाटक के पास बिछा ट्रैक बेहद पुराना होने की वजह से कमजोर भी हो चुका है। बीते दिनों यहां एक मालगाड़ी डिरेल हो गई थी। इससे करीब 10 घंटे गाजियाबाद-टूंडला रूट बाधित रहा था।
ट्रैक पर ट्रेनों की भीड़ से बिगड़ा शेड्यूल
2020 तक 95 फीसदी ट्रेनें समय से चलाने का वादा किया है, लेकिन यह आसान नहीं है। ट्रैकों पर क्षमता से ज्यादा ट्रेनें उतार दी गई हैं।
जितनी दूरी में पहले दो ट्रेनें रहती थीं, अब इंटरलॉकिंग सिग्नल प्रणाली के बाद तीन ट्रेनें रहती हैं। ऐसे में ट्रेनों की रफ्तार पर भी असर पड़ता है। एक ट्रेन किसी वजह से लेट हुई तो फिर अन्य भी लेट हो रही हैं।
ट्रेनों को तो समय पर दौड़ाइए
बृहस्पतिवार को आनंद विहार-कोलकाता एक्सप्रेस 4:30 घंटे देरी से रवाना हुई। इसके अलावा 23 फरवरी को नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस 10:45 घंटे 24 फरवरी को 13 घंटे लेट गाजियाबाद पहुंची थी।
23 फरवरी को महानंदा एक्सप्रेस 4:15 घंटे लेट थी, गोल्डन टैंपल एक्सप्रेस 2:15 घंटे और छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस 2:45 घंटे लेट थी। 24 फरवरी को फरक्का एक्सप्रेस 3:30 घंटे लेट थी।