फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Delhi: अब अस्पतालों में ही हो जाएगी बधिर नवजातों की पहचान, 20 से अधिक अस्पतालों में शुरू हुई स्क्रीनिंग

Tue, 06 Feb 2024 05:10 AM IST
विजय पुंडीर राकेश शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

विशेषज्ञों की माने तो पैदा हुए करीब एक हजार बच्चों में तीन से पांच ऐसे बच्चे होते हैं जिनमें सुनने की क्षमता नहीं या बहुत कम होती है। इन बच्चों के कानों तक आने वाली तरंग उनके मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में वह आवाज को सुन नहीं पाते।
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Getty
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

डिलीवरी के बाद अस्पताल से घर पहुंचने से पहले बधिर बच्चों की पहचान हो जाएगी। दिल्ली के अस्पतालों में ऐसे बच्चों की पहचान के लिए विशेष स्क्रीनिंग प्रोग्राम शुरू किया गया है। इसे केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के 31 अस्पतालों में चलाया जाएगा, जो फिलहाल 20 से अधिक अस्पतालों में शुरू हो गया है। इसमें अस्पताल के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में पैदा हुए नवजात के कान की जांच की जाएगी। साथ ही जरूरत के आधार पर इलाज दिया जाएगा। विशेषज्ञों की माने तो पैदा हुए करीब एक हजार बच्चों में तीन से पांच ऐसे बच्चे होते हैं जिनमें सुनने की क्षमता नहीं या बहुत कम होती है।

विज्ञापन


इन बच्चों के कानों तक आने वाली तरंग उनके मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में वह आवाज को सुन नहीं पाते। अक्सर ऐसे बच्चों की पहचान न होने के कारण उम्र बढ़ने के बाद वह दिव्यांग हो जाते हैं। इसी समस्या को देखते हुए ऐसे बच्चों की पहचान करने के लिए स्क्रीनिंग प्रोग्राम का विस्तार किया गया है। स्क्रीनिंग में पकड़ आने वाले ऐसे बधिर नवजात में ऑपरेशन से इंप्लांट बच्चे के कान में प्रत्यारोपित किए जाएंगे। इसकी मदद से बच्चा 100% तक सुन सकेगा। साथ ही, बोलने की क्षमता भी विकसित हो जाएगी।

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में कान, नाक और गला विभाग के प्रोफेसर निदेशक डॉ. रवि मेहर का कहना है कि फिलहाल इस प्रोग्राम को 20 से अधिक अस्पतालों में शुरू किया गया है। जल्द ही यह प्रोग्राम दिल्ली के सभी अस्पतालों में शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि कम उम्र में ही समस्या पकड़ में आ जाती है तो इलाज आसान हो जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

सुनने के साथ मिलती है बोलने की क्षमता
डॉक्टरों की माने तो सुनने के साथ बोलने की क्षमता भी विकसित होती है। बधिर बच्चों का यदि समय पर इलाज हो जाता है तो उनमें बोलने की क्षमता भी विकसित होने लगी है। बोलने का सीधा संबंध सुनने से हैं। जब हम किसी भी ध्वनि को सुनने हैं तो वह हमारे दिमाग में तरंग बनाता है जो हमारे बोलने की ग्रंथियों को जागृत करता है। दिल्ली के आंकड़े बताते हैं कि राजधानी के अस्पतालों में हर साल एक लाख से अधिक बच्चे पैदा होते हैं। इनमें काफी बच्चे मूक-बधिर होते हैं। समय पर इनकी पहचान होने से इनकी दिव्यांगता को दूर किया जा सकेगा।

हो रहे हैं यह टेस्ट
नवजात प्रारंभिक मूल्यांकन विजन (एनईईवी) अभियान के तहत नवजात में ओटो कास्टिक एमिशंस (ओएई) और ब्रेन इवोक्ड रिस्पॉन्स ऑडिटरी (बीईआरए) जांच होगी। ओएई जांच के लिए अस्पतालों में मशीनें आ गई हैं। स्टाफ को इनके संचालन का प्रशिक्षण दिया गया है। जांच से पता चल जाएगा कि नवजात बोल और सुन सकता है या नहीं। यदि नवजात पीड़ित पाया जाता है तो सर्जरी कर इंप्लांट लगाया जाएगा।

इनमें होती है समस्या
  • जन्म के दौरान वजन कम होना
  • प्रीमैच्योर बच्चे
  • पैदा होने के दौरान न रोने वाले बच्चे
  • पीलिया से ग्रसित
  • जन्म के समय ज्यादा समय आईसीयू में रहना
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें