सुनने के साथ मिलती है बोलने की क्षमता
डॉक्टरों की माने तो सुनने के साथ बोलने की क्षमता भी विकसित होती है। बधिर बच्चों का यदि समय पर इलाज हो जाता है तो उनमें बोलने की क्षमता भी विकसित होने लगी है। बोलने का सीधा संबंध सुनने से हैं। जब हम किसी भी ध्वनि को सुनने हैं तो वह हमारे दिमाग में तरंग बनाता है जो हमारे बोलने की ग्रंथियों को जागृत करता है। दिल्ली के आंकड़े बताते हैं कि राजधानी के अस्पतालों में हर साल एक लाख से अधिक बच्चे पैदा होते हैं। इनमें काफी बच्चे मूक-बधिर होते हैं। समय पर इनकी पहचान होने से इनकी दिव्यांगता को दूर किया जा सकेगा।
हो रहे हैं यह टेस्ट
नवजात प्रारंभिक मूल्यांकन विजन (एनईईवी) अभियान के तहत नवजात में ओटो कास्टिक एमिशंस (ओएई) और ब्रेन इवोक्ड रिस्पॉन्स ऑडिटरी (बीईआरए) जांच होगी। ओएई जांच के लिए अस्पतालों में मशीनें आ गई हैं। स्टाफ को इनके संचालन का प्रशिक्षण दिया गया है। जांच से पता चल जाएगा कि नवजात बोल और सुन सकता है या नहीं। यदि नवजात पीड़ित पाया जाता है तो सर्जरी कर इंप्लांट लगाया जाएगा।
इनमें होती है समस्या
- जन्म के दौरान वजन कम होना
- प्रीमैच्योर बच्चे
- पैदा होने के दौरान न रोने वाले बच्चे
- पीलिया से ग्रसित
- जन्म के समय ज्यादा समय आईसीयू में रहना