नगीना। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े होने के गंभीर आरोपों में करीब 8 साल से तिहाड़ जेल में बंद मेवात क्षेत्र के गुमट बिहारी गांव निवासी अब्दुल सुभान, वाजिदपुर गांव निवासी मोहम्मद शाहिद, टांई निवासी मोहम्मद राशिद और राहुका गांव निवासी अशबुद्दीन को बाइज्जत बरी कर दिया था। मंगलवार शाम घर पहुंचने के बाद अब्दुल सुभान की आंखों से भाई से मिलकर आंसू निकल आए। अब्दुल सुभान ने कहा कि उन पर यूएपीए की धाराएं लगाई गई थीं। जिन पर सुप्रीम कोर्ट इन दिनों तल्खी से बातचीत कर रहा है। आठ साल में हमें कभी जमानत नहीं दी गई। परिजनों का निधन होने के बाद वह उनकी अंतिम यात्रा में शामिल तक नहीं हो सके।
पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने सोमवार को फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि आरोपी व्यक्तियों को लश्कर-ए-तैयबा से जोड़ने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है इसलिए यूएपीए की धारा 18 व 20 नहीं लगानी चाहिए थी। जज ने कहा, अभियोजन पक्ष ने आरोपी व्यक्तियों और आतंकवादी जावेद बलूची के बीच इंटरसेप्ट की गई बातचीत पर बहुत अधिक भरोसा किया है। इन टिप्पणियों के साथ ही अदालत ने अपने फैसले में आरोपी मोहम्मद शाहिद, मोहम्मद राशिद, अशबुद्दीन और अब्दुल सुभान को बरी किया जाता है।
अमर उजाला से बातचीत में अब्दुल सुभान ने कहा कि वह आतंकवादी गतिविधियों से नहीं जुड़े हैं। जिस शाहिद ने मेरा नाम लिया था उसे वह जानते तक नहीं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के मनगढ़ंत और बेबुनियाद आरोपों लगाए थे। उन्होंने कहा कि भले ही हम बाइज्जत बरी हो गए हो लेकिन समाज और इलाका हमें क्या दूसरी नजर से देखेगा। बगैर पर्याप्त सबूत के 8 साल में तिहाड़ जेल रहा हूं। इस लड़ाई में जमीयत उलेमा हिंद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने हमें कानूनी सहायता दी। उन्होंने आगे कहा कि अभी अधिवक्ताओं से राय मशवरा किया जा रहा है इसके बाद मुआवजे का मुकदमा करेंगे।
मुझे यकीन था पिता बेगुनाह साबित होंगे
अब्दुल सुभान के बड़े बेटे मोहम्मद आलम कहते हैं कि उन्हें पहले दिन से ही विश्वास था कि पिता समेत अन्य आरोपी बेगुनाह हैं। इन्हें जानबूझकर किसी के इशारे पर फंसाया गया था। आलम ने कहा कि उन्हें कानून पर भरोसा था। आठ साल बाद उन्हें न्याय मिला है। उन्होंने भारतीय न्याय प्रणाली का तहे दिल से शुक्रिया अदा किया है।