नोएडा (संजय शिशौदिया)। कोरोना संक्रमण ने पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे को तो प्रभावित किया ही है। अब चुनाव भी इस संक्रमण से अछूता नहीं है। चंद साल पहले तक जहां गली-चौराहों और बाजारों में बजने वाले देशभक्ति गाने, पार्टियों के नेताओं की रैलियां, रोड शो, जनसभा और इस दौरान बंटने वाले झंडे, बिल्ले चुनाव होने का अहसास कराते थे, लेकिन इस बार सब कुछ गायब है। नेताओं की पहचान अब झंडे, बिल्लाें से ज्यादा उनकी टोपियों और गमछे से होने लगी है।
जिले में पहले चरण में ही 10 फरवरी को मतदान है। प्रत्याशियों की बात करें तो उनके पास चुनाव प्रचार के लिए अब लगभग 10-12 दिन ही बाकी हैं। आयोग की पाबंदी ने नेताजी के हाथ बांध रखे हैं। जब चुनावी सभा, रोड शो या किसी बडे़ नेता की रैली ही नहीं होगी तो झंडे-बैनर का नेताजी क्या करेंगे। ऐसे में नेताजी खुद ही अपने परिजनों, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं। लोग भी नेताजी को अब उनकी टोपियों के रंग से ही पहचानने लगे हैं। लाल टोपी है तो सपाई, नीली बसपाई, सफेद आम आदमी पाटी और हरी टोपी है तो रालोद के नेता की पहचान होती है। भाजपाइयों की पहचान गले में पड़ा भगवा गमछा करता है।
झंडे से ही टोपियों तक पहुंचा रंग
राजनीतिक दलों की टोपियां का रंग जैसे उनके झंडे से ही लिया गया है। रालोद का झंडा हरे रंग का है तो टोपी हरे रंग की हो गई। इसी प्रकार बसपा का झंडा नीले रंग का है तो टोपी पर भी यह रंग उतर आया। सपा का झंडा लाल और हरे रंग का है तो टोपी लाल हो गई। आम आदमी पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि सफेद रंग चूंकि शांति का प्रतीक होता है, इसलिए पार्टी ने इस रंग की टोपी को ही तवज्जो दी है।
दुकानदारों को भी टोपियों के ही ज्यादा मिल रहे ऑर्डर
चुनाव सामग्री बेचने वाले दुकानदारों की मानें तो इस बार झंडे, बिल्लों की बिक्री न के बराबर है। सबसे ज्यादा डिमांड में टोपियां ही हैं। दुकानदार दुष्यंत गुप्ता की माने तो चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा बिक्री झंडों की होती है। इस बार छोटे झंडे ही थोड़ा-बहुत बिक रहे हैं। बिल्लों का चलन तो अब लगभग खत्म हो चुका है। टोपियां और गमछे की डिमांड ज्यादा है।