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मोदी जी! यहां पढ़ने की जगह नहीं, टॉयलेट कहां बनाएं?

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नेताजी और अधिकारियों के बच्चे फाइव स्टार स्कूलों में पढ़ते हैं। वहां पर एसी कमरे और चमचमाते टॉयलेट होते हैं। फिर ये लोग भला सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने में दिलचस्पी क्यों लेंगे। कई प्राइमरी स्कूलों की दशा बद से बदतर है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से शौचालयों पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया था, लेकिन यहां तो बच्चों को बैठने के लिए पर्याप्त जगह और छत ही नहीं है, शौचालय की बात तो दूर है।

बुधवार को जब ‘अमर उजाला’ टीम फरीदाबाद के न्यू टाउन रेलवे स्टेशन के पास स्थित मिल्हार्ड कॉलोनी पहुंची तो स्थिति हैरान करने वाली थी। यहां छोटी सी जगह पर करीब पांच सौ बच्चे बैठकर पढ़ाई कर रहे थे।
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दो फीट संकरी गली से होकर जब हम स्कूल पहुंचे तो न शौचालय मिला और न ही पढ़ाई का उचित माहौल। ज्यादातर बच्चे जमीन पर बैठकर विपरीत परिस्थितियों में पढ़ाई कर रहे थे। पेश है संवाददाता ओम प्रकाश एवं गौरव चौधरी की रिपोर्ट:

बेसमेंट के अंधेरे कमरे में पढ़ते हैं बच्चे

इस स्कूल में कुल 470 बच्चे हैं, जिनमें से 256 लड़कियां हैं। लेकिन उनके लिए टॉयलेट नहीं है। ये बच्चे इसके लिए या तो बाहर मैदान में जाते हैं या फिर पेशाब-टॉयलेट रोक कर बीमारी को न्योता दे रहे हैं। कुछ बच्चे बेसमेंट में बने अंधेरे कमरों में बैठते हैं तो कुछ ऊपर।

स्कूल की इंचार्ज सुषमा अरोड़ा बताती हैं कि कुल एरिया 180 वर्ग गज है। यह जगह प्राइमरी स्कूल को मान्यता देने के मानक से बहुत कम है। छोटे-छोटे पांच कमरों में 10 क्लास चलती हैं।

अगर दफ्तर की जगह को छोड़ दिया जाए तो एक वर्ग गज में तीन बच्चे बैठकर पढ़ाई करते हैं। इस जगह में स्कूल चलाएं या टॉयलेट बनाएं। सुबह प्रार्थना में बच्चे एक साथ खड़े नहीं हो सकते। हां, यहां स्टॉफ के लिए एक टॉयलेट जरूर बनवाया गया है।

इस कॉलोनी के स्कूल में जहां पढ़ने की जगह नहीं है वहां फिर बच्चों के खेलने-कूदने की बात बेमानी सी लगती है। यह स्लम कॉलोनी है इसलिए ज्यादातर बच्चे बहुत गरीब घरों के हैं। ऐसे में उनके लिए पढ़ाई-लिखाई का उचित माहौल बनाने की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है।
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यहां घुटता है बच्चों का दम

स्कूल में हेड टीचर का पद खाली है। सीनियर टीचर को इंचार्ज बनाया गया है। कुल सात में से पांच गेस्ट टीचर हैं। जबकि यहां पर कायदे से 12 लोगों का स्टॉफ होना चाहिए। स्टाफ कम होने के कारण इसे सिंगल शिफ्ट में कर दिया गया है इसलिए भीड़ बढ़ गई है।

अध्यापिकाओं का कहना है कि जब भीषण गर्मी पड़ रही होती है तो मासूम बच्चे परेशान होने लगते हैं। खुली हवा नहीं मिलती। वे पसीने में तर रहते हैं। आसपास गंदगी फैली हुई है। स्कूल प्रबंधन छुट्टी कर नहीं सकता। पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बच्चे बीमार पड़ जाएं तो बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है। इसलिए ज्यादातर बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ते हैं।

राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रधान चतर सिंह के मुताबिक एक प्राइमरी स्कूल के लिए कम से कम 2500 वर्गगज जगह होनी चाहिए। पीने के पानी और टॉयलेट का इंतजाम होना चाहिए। हवादार कमरें और खेलने-कूदने की जगह होनी चाहिए। लेकिन स्लम के स्कूलों में ऐसा नहीं है। इसलिए हम इन्हें स्लम से बाहर शिफ्ट करने की मांग कर रहे हैं।

बल्लभगढ़ क्षेत्र की खंड शिक्षा अधिकारी अनिता शर्मा ने बताया ‌कि इस स्कूल में कई बार अधिकारियों ने दौरा किया है। यहां जमीन की समस्या है, जिसकी वजह से टीचर और बच्चे सभी को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बच्चों के लिए टॉयलेट नहीं है। अब फरीदाबाद में जगह काफी महंगी हो गई है, इसलिए कोई देने के लिए राजी नहीं है। हमने ऊपर रिपोर्ट भेजी हुई है, लेकिन लगता है कि इसका इलाज एमपी, एमएलए ही करवा सकते हैं।
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