सुरेंद्र कोली को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उसकी दया याचिका के निस्तारण में सरकार के अधिकारियोें ने स्थापित नियमों की धज्जियां उड़ा दी।
विधि और न्यायशास्त्र के जिन सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है उसकी भी अनदेखी की गई। न्यायिक पुनरीक्षण करते हुए निम्नलिखित तथ्यों का उल्लेख किया गया, जिससे फांसी का फैसला पलट गया।
कोली को सेशन कोर्ट गाजियाबाद ने 13 फरवरी 09को फांसी की सजा सुनाई थी। 11 सितंबर 09को हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट ने 15 फरवरी 11 को कन्फर्म कर दिया। कोली की अपील खारिज हुई।
नियमानुसार सुप्रीमकोर्ट से अपील खारिज होने की सूचना जेल अधीक्षक द्वारा बंदी को देनी चाहिए। सूचना के सात दिन में दया याचिका दाखिल होनी चाहिए। कोली ने सात मई 11 को दया याचिका दाखिल की जिसका निस्तारण राज्यपाल द्वारा दो अप्रैल 2013 को किया गया।
दया याचिका दाखिल होने के बाद 20 मई 11 को सरकार ने 11 बिंदुओं पर डीएम और जेल अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी। नौ जून 11 को सरकार ने डीएम को रिमांडर भेजा। डीएम और जेल अधीक्षक ने 26 अक्तूबर 12 को अपनी रिपोर्ट दी।
इसमें याचिका पर विचार 13 अप्रैल 05 के शासनादेश के आधार पर होगा। प्रमुख सचिव कारागार हर पहलू की जांच करें। 13 नवंबर 12 को विशेष सचिव न्याय ने टिप्पणी लिखी की 05 के शासनादेश के तहत गठित कमेटी के समक्ष मामला रखा जाए।
कारागार विभाग ने यह कहते हुए फाइल लौटाई की फांसी के मामले में उनके विभाग द्वारा विचार नहीं होगा। प्रमुख सचिव गृह ने कोली की फाइल पर टिप्पणी लिखी कि गृह विभाग को अपनी राय देने का क्षेत्राधिकार नहीं है।
यह भी लिखा कि दया याचिका स्वीकार योग्य नहीं है। 31 जनवरी 13 को विशेष सचिव न्याय ने टिप्पणी लिखी की गृह विभाग ने राय दे दी है। इसे छह फरवरी 13 को प्रमुख सचिव न्याय ने स्वीकार कर लिया।
डासना जेल के रिकार्ड से पता चला कि सुरेंद्र कोली को सेशन कोर्ट द्वारा फांसी सुनाए जाने के बाद उसे बैरक संख्या छह में तन्हाई मेें रखा गया।
इस बैरक में दस कमरे हैं। हर बंद को अकेले कमरे में रखा गया। जबकि प्रदेश सरकार ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि कोली को लोगों से मिलने जुलने की छूट है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने तीन मई 11 , दो सितंबर 14 और तीन सितंबर 14 को डेथ वारंट जारी किया गया।
इसकी सूचना कोली को नहीं दी गई। एडीजे ने पहले डेथ वारंट के लिए 24 मई 11 से 31 मई 11 के बीच किसी भी दिन फांसी देने की अनुमति दी।