देश को दहला कर रख देने वाले निर्भया मामले के बाद लोगों के जीवन में कई अहम बदलाव देखने को मिले थे। कानून बदले तो लोगों की आदतें भी बदल गईं। सुप्रीम कोर्ट ने कई बातों पर स्वतः संज्ञान लेकर ट्रैफिक नियमों में परिवर्तन कर दिया। कुछ नियम जस्टिस जेएस वर्मा आयोग की सिफारिशों के आधार पर बदले गए। वाहनों के शीशों पर दिखाई देने वाली काली फिल्में उतर गईं।
सबसे पहले दिल्ली पुलिस मुख्यालय में खड़ी सभी गाड़ियों की फिल्में हटाई गईं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि वाहन पर किसी भी स्तर की कोई फिल्म नहीं लगेगी। पर्दे और विंडो शील्ड भी नहीं लगाए जा सकते। गाड़ी सरकारी हो या प्राइवेट, सभी से काली फिल्म हटा दी गईं।
बता दें कि जिस बस में निर्भया के साथ दरिंदगी हुई थी, उस वक्त बस में पर्दे लगे हुए थे। कुछ शीशों पर काली फिल्म भी थी। जांच कमेटियों ने भी ये सवाल उठाया कि अगर बस में काली फिल्म या पर्दे नहीं होते, तो इतनी बड़ी दरिंदगी को टाला जा सकता था। 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने 4 मई से नियमित चेकिंग अभियान शुरू कर दिया था।
पहले 28 दिन में 67 हजार से ज्यादा वाहनों पर लगी काली फिल्म उतारी गईं। हालत ये हो गई थे कि दो-तीन माह में करीब अस्सी फीसदी वाहनों से फिल्म हटा ली गई। काली फिल्म हटाने का सौ फीसदी टारगेट पूरा करने के लिए ट्रैफिक पुलिस ने अपना अभियान तेज कर दिया। दिल्ली में तीन माह के दौरान एक लाख 41 हजार वाहनों से काली फिल्म उतारकर उनका चालान कर दिया गया।
जल्द ही वाहन चालकों ने काले शीशे और फिल्म का तोड़ निकाल लिया था। चूंकि तब तक ट्रैफिक पुलिस के पास ऐसा कोई मापक यंत्र नहीं था, जो निर्धारित मानकों के मुताबिक काली फिल्म और शीशे की पहचान कर सके। इस वजह से सरकारी वाहनों पर काले शीशे या हल्की फिल्म लगी हुई मिलीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले वाहनों पर 70:50 के अनुपात में फिल्म या काला शीशा लगता था। मतलब आगे-पीछे के शीशे का दृश्यता स्तर 70 फीसदी और साइड के शीशों का स्तर 50 फीसदी रहता था। निर्भया मामले के बाद गाड़ियों से फिल्म पूरी तरह उतर गई।