राजधानी को आवारा कुत्तों से मुक्त कराने में नाकाम रहने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर तीनों नगर निगम मेहरबान हो गई हैं।
उन्होंने कुत्तों की नसबंदी करने पर एनजीओ को दी जाने वाली राशि में बढ़ोतरी करने का फैसला किया है। इसके लिए निगमों ने विभिन्न महानगरों में दी जा रही राशि और महंगाई का हवाला दिया है।
बता दें कि वर्ष 2003 में नगर निगम ने आवारा कुत्तों की नसबंदी कराने की शुरुआत की थी। इसके लिए उसने दस एनजीओ के साथ अनुबंध कर रखा है। ये एनजीओ प्रतिवर्ष करीब 20 हजार कुत्तों की ही नसबंदी कर पाती हैं। तीनों नगर निगम ने अब दो स्थितियों में कुत्तों की नसबंदी करने पर दी जाने वाली राशि बढ़ाने का प्रस्ताव तैयार किया है।
इसके मुताबिक नगर निगम की ओर से पकड़े गए कुत्ते की नसबंदी करने पर एनजीओ को दी जाने राशि 408 रुपये से बढ़ाकर 700 रुपये की जाएगी। वहीं स्वयं कुत्ता पकड़कर नसबंदी करने पर एनजीओ को दी जाने वाली राशि 445 रुपये से बढ़ाकर 770 रुपये करने पर सहमति बनी है।
खास बात यह है कि कुत्तों की नसबंदी करने के लिए प्रतिवर्ष तय किए जाने वाला पूरा बजट खर्च नहीं हो पाता है।
गौरतलब है कि राजधानी में कुत्तों की संख्या पता लगाने के लिए तीन बार सर्वे हो चुका है। इनसे आवारा कुत्तों की संख्या में भारी बढ़ोतरी का पता चला है। वर्ष 1987 में दिल्ली में आवारा कुत्तों की संख्या करीब पौने दो लाख थी, लेकिन दस वर्ष बाद किए गए सर्वे में यह संख्या साढ़े तीन लाख तक पहुंच गई।
इसी तरह दो वर्ष पहले किए सर्वे में पता चला है कि राजधानी में आवारा कुत्तों की संख्या पांच लाख से अधिक हो चुकी है। ये कुत्ते रोजाना करीब 50 लोगों को काट लेते हैं।