फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

काटजू के बयान से मचा बवाल, फिर उठे सवाल

विज्ञापन
विज्ञापन
जस्टिस मार्कंडेय काटजू के खुलासे से उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की मौजूदा कोलेजियम व्यवस्था पर बहस छिड़ गई है।
विज्ञापन


इस प्रणाली के खिलाफ संसद में लगातार सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अब इस व्यवस्था की मुखालफत में वकील भी खड़े हो गए हैं।

लंबे अरसे बाद न्यायिक भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करने के जस्टिस काटजू के फैसले का सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी समर्थन किया है। जबकि मौजूदा भाजपा सरकार ही नहीं, बल्कि तत्कालीन यूपीए सरकारें भी कोलेजियम सिस्टम में बदलाव पर जोर देती रही हैं।

पार्टी की पसंद से नियुक्त हुए जज?

कैंपेन फार ज्यूडीशियल अकाउंटबिलिटी एंड रिफार्म (सीजेएआर) के संयोजक व अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा है कि जस्टिस काटजू के खुलासे से उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया की गंभीर समस्या एक बार फिर सामने आ गई है।

उन्होंने इंगित किया है कि पूरी जानकारी होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की ओर से चेन्नई के जज की नियुक्ति की गई क्योंकि वह डीएमके पार्टी का पसंदीदा था। इसका कारण उसकी ओर से पार्टी के सुप्रीमो करुणानिधि को जमानत दिया जाना भी था।

कुछ जज, जो कोलेजियम में शामिल थे। उन्होंने उसकी नियुक्ति की थी और इसमें पूर्व चीफ जस्टिस वाईके सब्बरवाल और जस्टिस केजी बालकृष्णन थे, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगे हैं।

प्रशांत भूषण ने लगाए आरोप

भूषण ने कहा है कि ब्रिटेन समेत अन्य तमाम देशों ने अब न्यायिक नियुक्तियों के लिए स्वतंत्र आयोगों का गठन किया है। जो आवेदनों और नामितों की निर्धारित कसौटी के मुताबिक नियुक्ति करते हैं।

देश में भी ऐसे ही आयोग की जरूरत है, जो पूरी पारदर्शिता के साथ न्यायपालिका में नियुक्ति का जिम्मा निभाए।

भूषण के मुताबिक यह पूरा मसला यह स्पष्ट करता है कि तमाम संदेहास्पद लोग न्यायपालिका के शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। जहां पहुंचकर वह और ऐसे लोगों की नियुक्ति न्यायपालिका में करते हैं।
विज्ञापन

जजों पर रहता है नेताओं का दबाव!

इससे यह भी साफ होता है कि कोलेजियम में शामिल जजों पर राजनेताओं का भी काफी दबाव रहता है और जज अपने निहित स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए जजों की नियुक्ति करते हैं।

सरकार की ओर से न्यायिक नियुक्तियों के लिए एक नया कानून बनाया जाना प्रस्तावित है, जिसमें नियुक्तियों वाली समिति में कुछ नामित कानूनविदो और कानून मंत्री को शामिल किया जाना है। लेकिन इससे तो सिर्फ सरकार का जुड़ाव नियुक्ति प्रक्रिया में बढ़ जाएगा।

इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता में समझौते की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन नियुक्तियों में मौजूदा समस्या हल नहीं होगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें