दिल्ली विधानसभा जहां लगती है, उस सदन में एक सुरंग है। यह सुरंग लालकिला तक है या फिर मैटकॉफ हाउस तक या किसी अन्य जगह निकलती है, इसका रहस्य बरकरार है। सचिवालय में जिससे बात करें, अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं।
विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल मानते हैं कि सुरंग का कोई प्रमाणिक प्रमाण नहीं मिला है कि ये कहां तक है। ऐसे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने भी कोई संपर्क नहीं साधा है, रहस्य बरकरार है। रामनिवास गोयल का कहना है कि सुनी-सुनाई बात पर सुरंग का ढक्कन खुलवाया।
कोई लिखित प्रमाण नहीं मिला है कि सुरंग कहां तक की है या किस काम के लिए इस्तेमाल की जाती थी। लेकिन, ऐसा सुनने में आया है कि सदन का इस्तेमाल न्यायालय के तौर पर होता था। यह रास्ता लालकिला से सदन तक है। लेकिन वास्तविकता रिसर्च का विषय है।
'सुरंग में अभी मिट्टी भरी हुई है'
दिल्ली विधानसभा में खोजी गई सुरंग
इसे लेकर एएसआई को भी लिखेंगे। अभी उसमें लाइट लगवा रहे हैं और मुहाने पर टफन ग्लास का ढक्कन लगवाएंगे। रामनिवास गोयल कहते हैं कि सुरंग में मिट्टी भरी हुई है।
फिर कई जगह फ्लाईओवर, मेट्रो निर्माण हुआ है। सुरंग बची है या नहीं, ये तो रिसर्च के बाद ही पता चलेगा। लेकिन 23 मार्च को शहीद दिवस पर विशेष लोगों को सुरंग दिखाई जाएगी।
एक अधिकारी का कहना है कि 1982 में जब विधानसभा के अंदर नवीनीकरण का काम करवाया था, तब सुरंग के मुहाने पर पत्थर लगवा दिया था। गिने-चुने लोगों को सुरंग के बारे में पता है।
सुरंग खुलवाकर देखा बंद थी
दिल्ली विधानसभा
ये सुरंग विधानसभा से लार्ड वायसराय के नए निवास मैटकॉफ हाउस तक है। जब आजादी का आंदोलन तेज हो गया था तो वायसराय मैटकॉफ हाउस से सदन में इसी सुरंग के रास्ते बग्गी से आते थे, जो वहां एक कमरे में खुलता है। ये पुरानी किताबों में मिल जाएगा। एक अन्य कर्मी का कहना है कि सुरंग आगरा तक है, पन्नों में तलाशने की जरूरत है।
दिल्ली विधानसभा पर आधा दर्जन किताब लिख चुके विस के पूर्व सचिव एसके शर्मा कहते हैं कि कार्यकाल के दौरान सुरंग खुलवाकर देखी थी। लेकिन, आगे से बंद थी तो फिर बंद कर दी।
यहां 1926 तक सेंट्रल असेंबली लगती थी, जिसमें महात्मा गांधी भी बहस सुनने आ चुके हैं। इसके बाद महानगर परिषद् बनने तक ये हॉल डीयू को किराए पर दी जाती थी, जिसके प्रमाण भी उपलब्ध हैं। यहां डीयू का दीक्षांत समारोह भी होता था।