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पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में खनन मंजूरी को एनजीटी में चुनौती

Tue, 26 Apr 2016 05:13 AM IST
विवेक मिश्रा/अमर उजाला, नई दिल्ली
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देश भर में पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में खनन के लिए जिला स्तरीय पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (डीईआईएए) की ओर से निर्गत की जाने वाली पर्यावरण मंजूरी संबंधी अधिसूचना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चुनौती दी गई है।
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वहीं एनजीटी ने याची की दलीलों को सुनने के बाद पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित प्राधिकरणों को दो हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। बेंच ने कहा है कि इस मामले में पर्यावरण मंत्रालय ने जो भी अधिसूचना जारी की होगी, वह एनजीटी के अंतिम फैसले पर निर्भर होगी।

जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने याची व एडवोकेट अरविंद कुमार राय की याचिका पर विचार के बाद यह निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी। याचिका में कहा गया है कि 27 फरवरी 2012 से पहले पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में खनन के लिए पूर्व पर्यावरण मंजूरी हासिल करने का प्रावधान नहीं था।
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खनन प्रोजेक्ट से पहले पर्यावरण मंजूरी हासिल करनी होगी

एनजीटी
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दीपक कुमार के मामले में अपना फैसला देते हुए कहा था कि सभी तरह के खनन प्रोजेक्ट से पहले पर्यावरण मंजूरी हासिल करनी होगी। वहीं इस मामले में एनजीटी भी 2013 में आदेश दे चुका है।

याची ने यह भी आरोप लगाया है कि पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के फैसले को कमजोर करने के लिए जिला स्तर पर डीआईएए बनाने के संबंध में अधिसूचना जारी की। इसमें बड़े पैमाने पर खनन माफियाओं की लॉबिंग भी थी।

खासतौर से राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश में पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले खनन क्षेत्र मौजूद हैं। वहीं एनजीटी हिम्मत सिंह मामले में इस जिला स्तरीय डीआईएए को अवैध भी मान चुका है। इसके बावजूद यह काम कर रहे हैं। याची ने एनजीटी से मांग की है कि वह पर्यावरण मंत्रालय की इस अधिसूचना को निरस्त करते हुए, डीआईएए को तत्काल प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी देने पर रोक लगाए।
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याची का आरोप डीएम पूरी नहीं करते योग्यता

जमीन की खुदाई - फोटो : फाइल फोटो
पर्यावरण मंत्रालय ने इसी वर्ष जनवरी महीने में 15 और 20 तारीख को अधिसचना जारी कर पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में खनन गतिविधि को मंजूरी देने के लिए देश के प्रत्येक राज्य में जिलास्तरीय प्राधिकरण (डीईआईएए) बनाने का आदेश दिया था। साथ ही कहा था कि इस प्राधिकरण का अध्यक्ष जिलाधिकारी होगा।

एनजीटी में दाखिल याचिका में आरोप है कि पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ईआईएए) अधिसूचना, 2006 के मुताबिक, पर्यावरण मंजूरी जारी करने वाले प्राधिकरण का अध्यक्ष किसी पर्यावरणविद को होना चाहिए जबकि जिलाधिकारी इसके लिए योग्य नहीं हैं। वहीं चार सदस्यीय डीआईएए खनन माफियाओं का पक्षपात कर मंजूरी देने का भी आरोप लगाया गया है।

2013 में एडवोकेट अरविंद कुमार राय की याचिका का निपटारा करते हुए एनजीटी ने अपने फैसले में कहा था कि सभी ईंट-भट्ठों को संचालन से पहले संबंधित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्यस्तरीय पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण से पर्यावरण मंजूरी हासिल करनी होगी। इसके बाद से लगातार यूपी में इस फैसले का विरोध जारी है। यूपी में करीब 17 हजार ईंट-भट्ठें संचालन से पहले पर्यावरण मंजूरी हासिल करने के खिलाफ हैं।

वहीं इस चुनौती याचिका के बाद देशभर में 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में चलने वाले ऐसे ईंट-भट्ठों और खनन ठेकेदारों के लिए संकट पैदा हो गया है जो प्रभुत्व,  सिफारिश और जुगाड़ के जरिए जिलास्तरीय प्राधिकरण से पर्यावरण मंजूरी हासिल करते थे। क्योंकि एनजीटी ने अपने निर्देश में कहा है कि इस संबंध में पर्यावरण मंत्रालय की सभी अधिसूचना उसके अंतिम फैसले पर निर्भर होगी।
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