विशेषज्ञों ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय और भारतीय अध्ययनों के अनुसार, लगभग 35 प्रतिशत मानसिक विकार 14 वर्ष की उम्र से पहले होते हैं। इसके अलावा, 48 प्रतिशत 18 वर्ष से पहले और 60 प्रतिशत से अधिक 25 वर्ष की उम्र तक शुरू हो जाते हैं। इसका सीधा असर बच्चों और युवाओं की पढ़ाई, करियर, रिश्तों और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।
सम्मेलन में यह भी बताया गया कि एडीएचडी, एंग्जायटी और खाने से जुड़ी मानसिक बीमारियां अधिकतर 25 वर्ष की उम्र तक सामने आ जाती हैं, जबकि डिप्रेशन, नशे की लत और व्यवहार संबंधी समस्याएं अब पहले की तुलना में कम उम्र में ही देखी जा रही हैं।
60 प्रतिशत मानसिक रोग युवा वर्ग को प्रभावित कर रहे
इस दौरान एएनसीआईपीएस के आयोजन में सचिव डॉ. दीपक रहेजा ने कहा कि जब देश के 60 प्रतिशत मानसिक रोग युवा वर्ग को प्रभावित कर रहे हैं, तो यह एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय है। स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और समय पर पहचान अब बेहद जरूरी हो गई है।
सम्मेलन में युवाओं में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर भी चिंता जताई गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, आत्महत्या अब 15 से 29 वर्ष के युवाओं में मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। विशेषज्ञों ने इसका कारण पढ़ाई का दबाव, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, अकेलापन, नशा और भावनात्मक तनाव बताया।
मानसिक बीमारियों का समय पर इलाज जरूरी
डॉ. निमेश देसाई ने कहा कि यदि मानसिक बीमारियों का समय पर इलाज न हो, तो ये जीवन भर बनी रह सकती हैं। ऐसे में इसका असर व्यक्ति, परिवार व समाज सभी पर पड़ता हैं। वहीं, इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि युवाओं की बदलती जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आसान, सुलभ और बिना भेदभाव के बनाना होगा।
डॉ. टीएसएस राव ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य पर निवेश कोई खर्च नहीं, बल्कि देश के भविष्य में निवेश है। अगर युवा मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होंगे, तो भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभ का पूरा उपयोग नहीं कर पाएगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि भारत में मौजूदा समय तक भी 70-80 प्रतिशत मानसिक रोगियों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है, जो एक बड़ी चुनौती है।