जनवरी 1943 तक पंजाब की फिरोजपुर जेल में वह कैदी रहे। इसके बाद किशन लाल को अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। उस वक्त भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। किशन लाल जेल की यातना से घबराकर घर नहीं बैठे। इसकी जगह वह दुबारा से जंग-ए-आजादी में कूद पड़े।
जनवरी 1943 से जनवरी 1944 तक सक्रिय भागीदारी निभाई। इस दौरान कांग्रेस ने किशन लाल को दिल्ली के आंदोलनकारियों का नेतृत्व सौंपा था। उनकी अगुवाई में दिल्ली में भारत छोड़ो आंदोलन बढ़ा। जनवरी 1945 में वह दोबारा जेल गए और अगस्त 1947 तक रहे।
आजादी के बाद गांधी जी के कामों को संभाला
किशन लाल ने अपनी जवानी के 11 साल आजादी की लड़ाई में लगा दिए थे। ज्यादातर वक्त वह जेल में ही रहे। आजादी के बाद उन्होंने ग्रामीणों को चरखा कताई के लिए प्रोत्साहित किया। ग्रामीण कुटीर उद्योग में युवकों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाए। क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया।
तिब्बिया कालेज से वैद्यक की शिक्षा प्राप्त करने के कारण स्वयं भी लोगों का इलाज करते थे। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होने के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर कांग्रेस को तिलाजंलि दे दी और वह समाज सेवा में जुट गए।