उन्होंने कहा कि आंबेडकर समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे। गोवा में समान नागरिक संहिता है, जो पुर्तगालियों द्वारा लागू की गई थी, इसलिए वहां हिंदू, ईसाई और बौद्ध सभी ने इसे स्वीकार किया है, तो पूरे देश में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक हमारे पास सामाजिक लोकतंत्र नहीं है, तब तक हमारा राजनीतिक लोकतंत्र एक मृगतृष्णा है। यह सही बात है, ऐसा नहीं हो सकता कि अल्पसंख्यकों को सारे अधिकार दे दिए जाएं, लेकिन बहुसंख्यकों को वे सभी अधिकार न मिलें । कभी न कभी आपको ये इतना उल्टा पड़ जाएगा कि आप उसे संभाल नहीं पाएंगे।
कुलपति की जगह ‘कुलगुरु’ शब्द का इस्तेमाल हो
कुलपति ने कहा कि कुलगुरु शब्द के उपयोग का प्रस्ताव और अधिक लैंगिक तटस्थता लाने के उद्देश्य से किया गया है। जेएनयू की 14 सितंबर को कार्य परिषद की बैठक में इस पर विचार-विमर्श होना है। मैं कुलपति शब्द को बदलकर कुलगुरु करने का प्रस्ताव रखूंगी। जब मैं विश्वविद्यालय में आई थी तो हर जगह ही शब्द का इस्तेमाल हो रहा था, मैंने उसे शी किया। अब सभी दस्तावेजों में शी का इस्तेमाल किया जाता है।
मानव विज्ञान की दृष्टि से देवता ऊंची जाति से नहीं हैं
कुलपति ने कहा कि मानव-विज्ञान की दृष्टि से देवता उच्च जाति से नहीं हैं और यहां तक कि भगवान शिव भी अनुसूचित जाति या जनजाति से हो सकते हैं। मनुस्मृति में महिलाओं को दिया गया शूद्रों का दर्जा इसे असाधारण रूप से प्रतिगामी बनाता है। उन्होंने कहा कि मैं सभी महिलाओं को बता दूं कि मनुस्मृति के अनुसार सभी महिलाएं शूद्र हैं, इसलिए कोई भी महिला यह दावा नहीं कर सकती कि वह ब्राह्मण या कुछ और है और आपको जाति केवल पिता से या विवाह के जरिये पति की मिलती है।