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सरकारें पानी का बाजारीकरण करने में जुटी हैं कोई जल संकट का समाधान नहीं चाहता : जल पुरुष 

Sun, 15 May 2016 06:03 PM IST
कमल कश्यप/अमर उजाला, नई दिल्ली
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राजेंद्र सिंह - फोटो : कमल कश्यप
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फिलहाल देश का दो तिहाई हिस्सा जल संकट से जूझ रहा है और इसे लेकर राजनीति चरम पर है। कहीं वाटर ट्रेन भेजी जा रही है तो कहीं आईपीएल मैच को रद्द कराने की मांग हो रही है। इस समस्या पर अमर उजाला के कमल कश्यप ने जब जल पुरुष के नाम से मशहूर हो चुके मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह से बात की तो उनकी पीड़ा कुछ इस तरह सामने आ गई...
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प्रश्न-पूरा देश इस समय जल संकट से जूझ रहा है, आपको क्या लगता है केंद्र सरकार इस ओर गंभीर है?
उत्तर- मुझे तो बिल्कुल नहीं यह लगता कि सरकार इस पर गंभीर है। 13 राज्य के लोगों ने जंतर-मंतर पर जल सत्याग्रह कर ज्ञापन दिया। जिस भाषा में हमनें ज्ञापन दिया, सरकार ने उसी भाषा में बड़े-बड़े विज्ञापन दे दिए। लेकिन विज्ञापन देने से कुछ होने वाला है नहीं। यह सरकार दिखावा ज्यादा करती है़, लेकिन उस ढंग से काम नहीं हो रहा। सरकार विज्ञापन देकर अपने को मुक्त करना चाहती है। मैं कहूं तो सरकार की पानी बचाने में कोई रूचि है ही नहीं। नई सरकार को दो साल चुके हैं, लेकिन पानी पर सरकार ने अब तक कुछ ठोस नहीं किया है। सरकार पानी की मालिक तो बन गयी है, लेकिन यह मालिकाना हक वह प्राइवेट कंपनियों को दे रही है। मैं देखता हूं कि सरकार ने समाज के लिए पानी बचाना बंद कर दिया है। हमारी सरकारें प्राइवेटाइजेशन में जुटी हैं। दिल्ली हो, यूपी हो, एमपी हो या देश को कोई भी क्षेत्र हो, सरकार पानी का बाजारीकरण करने में जुटी है। जो समाज के लिए कुछ करना चाहता है सरकार उसे घेर लेती है, अफसर काम रूकवा देते हैं, तो भाई लोग डरते हैं। पानी बर्बाद हो रहा है होने दो आगे मत आओ सरकार घेर लेगी। लेकिन हम नहीं डरते हमारा अभियान जारी रहेगा। 

प्रश्न-सीडब्‍ल्यूसी गिरते भू-जलस्तर पर रिपोर्ट पर रिपोर्ट दे रही है, आप क्या कहते हैं?
उत्तर- देखो भाई रिपोर्ट देना तो उनका काम है, डयूटी है। लेकिन डयूटी यह भी है कि जल संकट के समाधान के लिए भी कुछ करें, सोचे। लेकिन करती नही है। सरकार ने समाज के हाथ से पानी छीन लिया है, नहीं छीनेगी तो प्राइवेट कंपनियां का पानी बिकेगा कैसे। 
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प्रश्न- रियल स्टेट कल्चर बढ़ने से भी क्या जल संकट पैदा हो रहा है?
उत्तर-बिल्कुल सरकार ऐसी जमीन रियल स्टेट के लोगों को दे रही है, जहां पानी संरक्षित किया जा सकता है, तालाब बनाए जा सकते हैं, बारिश का पानी इकठ्ठा किया जा सकता है, खेती की जा सकती है। पर वो तो रियल स्टेट को लोगों को दे दी गयी है। नहीं देगी तो सरकार को उसका  हिस्‍सा कहां से मिलेगा। जंगल उजाड़े जा रहे हैं, बिल्डिंग तो बन रही हैं, लेकिन रेन वाटर हारवेस्टिंग सिस्टम बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा। ऐसे में कैसे धरती के पेट तक पानी पहुंचेगा। हमारे भूमिगत जलाशय सूख रहे हैं भाई। ध्यान देना होगा इस तरफ नहीं तो पीने का पानी खत्म हो जाएगा। 

प्रश्न- गंगा-यमुना जैसी नदियां पानी का बड़ा स्रोत हैं, लेकिन अब यह भी सिकुड़ रही हैं, आप क्या कहते हैं?
उत्तर- देखो भाई हिमालय अब गंजा हो रहा है। सरकार वहां पर्यटन को तो बढ़ावा दे रही है, लेकिन उसे बचाने की ओर ध्यान नहीं दे रही। शिमला की आग, उत्तराखंड के जंगलों की आग और श्रीनगर के जंगलों की आग का मुख्य कारण तो यही है। पानी वहां बचा ही नहीं है। प्राकृतिक झरने, नाले, नदियां सूख रही हैं। नहीं सूखती तो उत्तराखंड की आग को तो बहुत जल्द काबू कर लिया जाता। जो उत्तराखंड देश की प्यास बुझाता है वो अब खुद पानी के लिए तरस रहा है। पहाड़ का पानी पहाड़ पर रोकने की बात तो सरकार सोच ही नहीं रही। हां पानी में राफ्टिंग, पर्यटन की ओर सरकार का पूरा ध्यान है। 

प्रश्न- आपने इस बर्बादी को रोकने लिए अब तक क्या प्रयास किए हैं?
उत्तर- पहाड़ी क्षेत्र में हिमाचल से लेकर उत्तराखंड तक हमने वहां के कई सीएम को अपना आइडिया दिया कि पानी को कैसे हम बचा सकते हैं, लेकिन सरकार ने उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया । खासकर उत्तराखंड बनने के बाद से वहां जितने भी सीएम रहे,  हमने सबसे मुलाकात की और पानी बचाने के लिए कई सुझाव दिए, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। क्योंकि सब बड़े बांधों में लगे हैं वहां से उनको लाभ होता है। हमने जो छोटे बांधों का प्रपोजल दिया था उसमें कौन सा पैसा मिलेगा। छोटे बांधों से नेताओं को कुछ नहीं मिलता हां बड़े बांधों से कुछ मिल जाता है। 

प्रश्न- देश में जल संकट बढ़ रहा है आपके हिसाब से कैसे इसे रोका जा सकता है?
उत्तर- हम जब राजस्‍थान गए थे पानी के लिए काम करने, तो लोग हम पागल तक कहते थे, लेकिन देखो आज वहां हमने नदियों को पुर्नजीवित करने से लेकर हजारों तालाब बना दिया। हमने धरती के पेट तक पानी पहुंचाया और वही पानी धरती हमें उलटा दे रही है। तो जब तक तालाब, बांध नदियों को जोड़ना, नहर आदि पर काम नहीं होगा संकट ऐसे ही बढ़ेगा। तालाब पर अवैध कब्जे करवाकर अफसर मौज मनाते हैं, नये तालाब तो छोड़िए पुराने ही हजम कर जाते हैं, तो धरती की प्यास कैसे बुझेगी। जहां बारिश अच्छी होती है वहां हमें बारिश के पानी को रोकना होगा, तालाब बनाने होंगे। नहीं किया तो परिणाम जल्द सामने होंगे।

प्रश्न- कांग्रेस सरकार के समय आप राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण  के सदस्य भी रहे, कुछ काम हुआ?
उत्तर- मेरे भाई सरकार बस कमेटियां बना देती है, उस और काम नहीं करती। गंगा सफाई, यमुना बचाओ बस कागजों में चलते हैं काम नहीं होता। 

प्रश्न-क्या मानते हैं देश की जल नीति क्या होनी चाहिए?
उत्तर- गंभीर प्रश्न-(हंसते हुए) नदियों को तो पुर्नजीवित करना ही होगा। बांध से लेकर तालाब पर काम करना होगा। पानी को दूषित करने वाली औद्योगिक ईकाईयों और लोगों के लिए सख्त कानून जरूरी है। और हां लोगों से अपील भी करता हूं कि पानी बर्बाद होने बचाएं, गंदा करने से बचाएं।
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