वहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजीव जयदेवन ने कहा, मुझे लगता है कि अभी सरकार की इस टिप्पणी पर और अधिक स्पष्टता की जरूरत है। हम सभी ने उन दिनों का सामना किया है। चिकित्सीय तौर पर ऑक्सीजन की कमी से मौत की पुष्टि करना जटिल है। वहीं अस्पतालों से बाहर की स्थिति जानना और भी मुश्किल है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों की बात करें तो इस साल देश भर में कोरोना संक्रमण की वजह से 2,62,670 लोगों की मौत हुई है। जबकि दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन व स्वास्थ्य सेवाओं का भारी संकट 12 अप्रैल से 10 मई के बीच देखने को मिला। इस दौरान अलग अलग राज्यों के अस्पतालों से सामने आईं तस्वीरें और कब्रिस्तान-श्मशान घाट की स्थिति काफी भयावह थी।
वाशिंगटन स्थित सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट की 20 जुलाई को जारी रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2020 से जून 2021 के बीच भारत में 50 लाख (4.9 मिलियन) लोगों की मौत कोरोना से हुई है। वहीं स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इस अवधि में 4.18 लाख लोगों की मौत हुई है।
मृत्यु प्रमाण पत्र पर नहीं लिख सकते ऑक्सीजन की कमी
डॉ. लहरिया ने कहा, उन दिनों अस्पतालों के अंदर, बाहर और घरों में मौतें हुईं। अस्पतालों में भर्ती मरीजों का पूरा रिकॉर्ड होता है लेकिन जो लोग बाहर मर गए या फिर जिनकी घरों में मौत हो गई, उनकी जानकारी किसी के पास नहीं है। ऑक्सीजन एक थैरेपी है। इसकी कमी के चलते किसी मरीज में ऑर्गन फेलियर हो सकता है और उसकी मौत हो सकती है। जब इस मरीज के मृत्यु प्रमाण पत्र की बात आएगी तो उस पर ऑर्गन फेलियर ही मौत का कारण होगा, न कि ऑक्सीजन। हालांकि हर अस्पताल के पास ऑक्सीजन आपूर्ति को लेकर पूरा रिकार्ड रहता है। उस मरीज की केस फाइल का ऑडिट करेंगे तो पता चलेगा कि उस दौरान अस्पताल में ऑक्सीजन बंद हुई थी अथवा नहीं? ऐसे मामलों के बारे में सरकार पता कर सकती हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सदन में दी गई जानकारी पर कहा कि राज्यों को अलग से कोई निर्देश नहीं दिए गए थे। कोविड-19 संक्रमण से मरने वालों की रिपोर्टिंग कैसे करनी है, इस बारे में बीते 25 मई को दिशा निर्देश जारी किए थे जिसमें राज्यों से होम आइसोलेशन में मरने वालों को भी कुल संख्या में शामिल करने के लिए कहा गया। इस पर अभी तक हर राज्य से पर्याप्त जानकारी नहीं आई है।
बाहर वाले का केवल रजिस्ट्रेशन होता है
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी व्यक्ति की मौत होने के बाद उसकी रिपोर्टिंग दो तरीके से होती है। पहली मृत्यु प्रमाण पत्र के जरिए, जिसे निगम/नगर पालिका जारी करती है। इसके लिए अस्पताल से मौत का कारण सहित तमाम जानकारी वाली एक पर्ची दी जाती है। दूसरा विकल्प किसी की मौत होने के बाद नजदीकी अस्पताल में रजिस्ट्रेशन का होता है। इसके अलावा अन्य कोई काम नहीं होता और यहां मौत के कारण की जानकारी भी नहीं होती। इस रजिस्ट्रेशन का इस्तेमाल इंश्योरेंस क्लेम या जमीन-संपत्ति इत्यादि के लिए इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि देश में मरने वालों के रजिस्ट्रेशन सबसे ज्यादा होते हैं और मृत्यु प्रमाण पत्र कम जारी होते हैं। अगर साल 2019 के आंकड़े देखें तो स्वास्थ्य मंत्रालय के ही अनुसार 76,41,076 मौत के रजिस्ट्रेशन हुए हैं लेकिन 15,71,540 ही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए गए।
अंतिम विकल्प: घर-घर सर्वे, मौखिक ऑटोप्सी जरूरी
विशेषज्ञों ने बताया कि अभी भी सरकार के पास दो अहम विकल्प मौजूद हैं। हाल ही में झारखंड में घर-घर सर्वे किया था जिसके आधार पर यह पता चल सके कि कितने लोगों की महामारी में मौत हुई है या फिर मरने वाले संदिग्ध थे। इसी तरह एक विकल्प मौखिक ऑटोप्सी का है जिसे अभी तक देश में एक बार इस्तेमाल किया जा चुका है। इसके तहत स्वास्थ्य कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाता है और वह पीड़ित या संदिग्ध परिवारों में जाकर जानकारी जुटाते हैं जिसकी जांच मेडिकल ऑफिसर करता है। इन दोनों विकल्प के जरिए सरकारें अपने अपने राज्य में ऑक्सीजन संकट और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से हुई मौतों की जानकारी एकत्रित कर सकते हैं।