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Delhi NCR News: राजधानी की होली में दिखती है पूरे देश की संस्कृति की झलक

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अमर उजाला ब्यूरो
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नई दिल्ली।
देश की राजधानी केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि संस्कृतियों का संगम भी है। यहां देश के लगभग हर राज्य और जिलों से लोग आकर बसे हैं। यही कारण है कि जब रंगों का त्योहार होली आता है तो दिल्ली की गलियों, कॉलोनियों और गांवों में केवल रंग ही नहीं, बल्कि परंपराओं की विविध छटा भी देखने को मिलती है। एक ही शहर में हरियाणा की तरह कोड़ामार होली, पंजाब की पकवानों वाली मस्ती, पूर्वांचल की गीत-संगीत से सजी होली और उत्तराखंड की सांस्कृतिक बैठकी होली साथ-साथ जीवंत हो उठती हैं। होेली खासियत यही है कि यहां अलग-अलग परंपराएं टकराती नहीं, बल्कि एक-दूसरे में घुल-मिल जाती हैं। कई कॉलोनियों में विभिन्न राज्यों के लोग होली के एक-दूसरे के अंदाज में शामिल होते हैं। दिल्ली में होली खेलना मानो पूरे देश की होली एक साथ देखने जैसा अनुभव है।
दिल्ली के बाहरी ग्रामीण इलाके नजफगढ़, बवाना, नरेला आदि में हरियाणा की झलक साफ दिखती है। यहां की पारंपरिक कोड़ामार होली में महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से पुरुषों को कपड़े के बने कोड़ों (कोलड़े) से मारती हैं और पुरुष उन पर बाल्टी से पानी डालते है और उसके माध्यम से ढाल के तौर पर बचाव करते हैं। यह सब हंसी-मजाक के बीच होता है। वहीं पश्चिमी दिल्ली के राजौरी गार्डन, पंजाबी बाग और तिलक नगर जैसे इलाकों में पंजाबी परिवार बड़ी संख्या में रहते हैं। यहां होली रंगों के साथ-साथ खाने-पीने और मेल-मिलाप का त्योहार बन जाती है। घरों में गुजिया के साथ पिन्नी, मठरी और खास व्यंजन तैयार होते हैं।
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पूर्वी दिल्ली और बाहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार) के लोग रहते हैं। यहां की होली फगुआ गीतों और पारंपरिक संगीत के बिना अधूरी मानी जाती है। कई जगहों पर सामूहिक फगुआ कार्यक्रम और सांस्कृतिक संध्या आयोजित होती है। जबकि उत्तराखंड के लोग भी दिल्ली में बड़ी संख्या में बसे हैं। उनकी होली शास्त्रीय संगीत और सामूहिक बैठकों के लिए जानी जाती है। बैठकी होली और खड़ी होली में लोग पारंपरिक परिधान पहनकर गीत गाते हैं।


गांवों में होली सिर्फ रंगों की नहीं, रिश्तों की भी होती है। कोड़ामार होली में देवर-भाभी और गांव की महिलाओं-पुरुषों के बीच मजाकिया नोकझोंक से माहौल खुशगवार बनता है।
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- प्रकाश चंद, मुबारकपुर डबास

गांव में महिलाएं एक महीना पहले ही होली खेलना शुरू कर देती है। फाल्गुन माह शुरू होते ही महिलाएं अपने देवरों पर पानी डालने लग जाती है और देवर होली के दिन उन पानी डालते है और मिठाई खिलाते है।
- प्रिया माथुर, मोहम्मदपुर मजरी

पंजाबी समुदाय के लिए होली दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने का बहाना है। सुबह रंग खेलते हैं और दोपहर को सब घर पर इकट्ठा होकर पकवानों का आनंद लेते हैं।
- सोनाली कपूर, ईस्ट आफ कैलाश

हम भले पंजाब से दूर हों, लेकिन यहां होली पर वही अपनापन महसूस होता है। रंगों के साथ ढोल और भांगड़ा माहौल को और रंगीन बना देते हैं।
- अनूज चोपड़ा, फतेहपुरी

पूर्वांचल में होली का मतलब ढोलक, मंजीरा और फगुआ है। होली खेले रघुवीरा जैसे गीतों के बिना त्योहार फीका लगता है।

- एडवोकेट अनिल पांडेय, सोनिया विहार

दिल्ली में रहकर भी हम अपनी मिट्टी नहीं भूले। यहां मोहल्ले में सब मिलकर होली गाते हैं, जिससे किसी पूर्वांचल के गांव जैसा माहौल बन जाता है।
- विकास झा, खजूरी खास

उत्तराखंड की होली में शोर से ज्यादा सुर होते हैं। तबला, हारमोनियम और रागों पर आधारित होली गीत हमारी पहचान हैं।
- शिव प्रसाद बलूनी, महरौली

दिल्ली में भी हम बैठकी होली का आयोजन करते हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का अवसर मिलता है।
- रामेश्वर गोस्वामी, मंडावली
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