बीते दस साल में बिक्री हुई आधी
उर्दू किताब की दुकान के मालिक रहमान के पास प्रतिदिन लगभग 20 ग्राहक आते हैं। हालांकि, ज्यादातर ग्राहक धार्मिक ग्रंथों जैसे कि कुरान के अनुवाद की तलाश में होते हैं। वे कहते हैं कि बहुत कम लोग साहित्य, राजनीतिक ग्रंथ या इतिहास की किताबें खरीदने आते हैं। पिछले 10 सालों में इन किताबों की बिक्री आधी रह गई है। उन्होंने कहा कि युवा अब पढ़ने या साहित्य के प्रति आकर्षित नहीं हैं। यह सिर्फ उर्दू भाषा की बात नहीं है, बल्कि दूसरी भाषाओं की भी बात है, आजकल लोग पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। उनका कहना है कि उर्दू बाजार अब खाना बाजार बन गया है।
इंटरनेट के कारण बिक्री पर असर
एक छोटी अस्थायी किताबों की दुकान चलाने वाले खुर्शीद आलम ने बताया कि उनके पिता के गुजर जाने और संपत्ति के बंटवारे के बाद उनके पास हिस्से में केवल यही आया है। उन्होंने बताया कि वह अपने परिवार में अकेले व्यक्ति हैं, जो उर्दू किताबें बेचते है। उन्होंने उर्दू बाजार के पतन का कारण इंटरनेट के आगमन को बताया। उनका दावा है कि लोग अर्थहीन वीडियो और रील से किताबों के महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। वे कहते हैं कि किताबें संस्कृति और सभ्यता की नींव हैं। पिछले 10 सालों में उर्दू किताबों की बिक्री आधी रह गई है। हालांकि, कुरान और हदीस जैसी धार्मिक किताबों की मांग में कोई खास बदलाव नहीं आया है।