केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड ने कहा कि जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी द्वारा अपने पुत्र को नायब इमाम और उत्तराधिकारी बनाने के लिए आयोजित समारोह की कोई कानूनी मान्यता नहीं है। हाईकोर्ट को यह जानकारी देते हुए वक्फ बोर्ड ने इस प्रकार का रवैया अपनाने पर बुखारी के खिलाफ कार्रवाई करने का भी तर्क रखा। इस मुद्दे पर अदालत अपना फैसला शुक्रवार को सुनाएगी।
मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी और न्यायमूर्ति आरएस एंडला की खंडपीठ के समक्ष बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड ने शाही इमाम के खिलाफ कड़ा रवैया अपनाया। दोनों ने स्पष्ट कर दिया कि जामा मस्जिद, शाही इमाम की निजी संपत्ति नहीं है और वह वक्फ बोर्ड के कर्मचारी के तौर पर मस्जिद में धार्मिक रीतियों को पूरा करते हैं।
जामा मस्जिद का पूरा स्वामित्व व प्रशासनिक जिम्मा वक्फ बोर्ड का है। उन्होंने इमाम द्वारा पुत्र को नायब इमाम बनाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह तर्क रखा। इसी के साथ 22 नवंबर को उत्तराधिकारी घोषित करने संबंधी कार्यक्रम पर भी सवाल उठने गया है।
इस बाबत हाईकोर्ट में तीन याचिकाएं पहले से ही दायर की गई थीं। बृहस्पतिवार को अंतिम मुगल बादशाह के बहादुर शाह जफर की सातवीं पीढ़ी के प्रिंस याकूब हबीबउद्दीन तुकी ने भी इस मुद्दे को लेकर याचिका दायर कर दी। उन्होंने कहा कि इमाम वंशानुगत नहीं हैं और न ही यह पद वंशानुगत है। उन्होंने कहा कि इमाम दिल्ली वक्फ बोर्ड का कर्मचारी हैं और उन्हें वेतन मिलता है।
सुनवाई के दौरान वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता ने कहा कि बोर्ड की जल्द ही बैठक होगी और बुखारी ने जो किया है उसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। वहीं, केंद्र सरकार की और से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस समारोह का आयोजन जामा मस्जिद के अलावा किसी स्थान पर बिना किसी कानूनी मान्यता के किया जा सकता है। लेकिन यदि मस्जिद में किया जाता है तो गैरकानूनी होगा।
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह सवाल किया कि क्या जामा मस्जिद बोर्ड की निगरानी में है और अगर यदि है तो वह इस मुद्दे पर क्या कर रहा है। खंडपीठ ने कहा कि अगर बोर्ड सक्षम प्राधिकार है तो उन्हें जांच करने दीजिए और वह जरूरी कदम उठाए।
वक्फ बोर्ड ने माना कि जामा मस्जिद उसकी निगरानी में है और मौजूदा इमाम खुद ही अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकते क्योंकि उसकी मंजूरी के बिना नियुक्ति की कोई कानूनी वैद्यता नहीं होगी। बोर्ड अधिवक्ता ने कहा कि मौजूदा इमाम की नियुक्ति 2000 में की गई थी लेकिन इमाम के रूप में उन्हें मंजूरी 2006 में मिली।
वहीं, याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क रखा कि इमाम बिना किसी कानूनी मान्यता के काम कर रहे हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि जामा मस्जिद के आसपास उनकी कई दुकानें भी हैं जो उच्च न्यायालय के 2005 के एक आदेश का उल्लंघन है।