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Delhi: यासिन मलिक के केस से दिल्ली हाई कोर्ट के जज ने खुद को किया अलग, एनआईए ने की है मौत की सजा की मांग

Thu, 11 Jul 2024 01:07 PM IST
विजय पुंडीर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अमित शर्मा ने गुरुवार को आतंकी फंडिंग मामले में अलगाववादी नेता यासीन मलिक के लिए मौत की सजा की मांग करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित शर्मा ने बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की ओर से कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक के लिए मृत्युदंड की मांग संबंधी अपील पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। यासीन मलिक को आतंकवाद वित्तपोषण मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। न्यायमूर्ति शर्मा 2010 में एनआईए के लिए विशेष लोक अभियोजक (एसपीपी) के रूप में मामले में पेश हो चुके हैं।

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न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की खंडपीठ के समक्ष अपील पर सुनवाई तय थी, लेकिन न्यायमूर्ति शर्मा के अलग होने पर न्यायालय ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के आदेशों के अधीन मामले को 9 अगस्त को एक अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया है।

पिछले साल पारित एक आदेश के अनुसार मलिक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) के जरिये तिहाड़ जेल से अदालत में पेश किया गया। इस साल की शुरुआत में एकल न्यायाधीश ने तिहाड़ जेल अधीक्षक को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि जेल अस्पताल में मलिक को उचित चिकित्सा प्रदान की जाए। मलिक ने एक याचिका दायर कर केंद्र सरकार और जेल अधिकारियों को उचित निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें आवश्यक चिकित्सा उपचार के लिए एम्स या किसी अन्य अस्पताल में शारीरिक रूप से रेफर किया जाए। क्योंकि वह हृदय और गुर्दे से संबंधित बीमारियों से पीड़ित हैं।

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कोर्ट ने सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा
निचली अदालत ने 24 मई, 2022 को मलिक को कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और आईपीसी के तहत विभिन्न अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मलिक ने आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए सहित अन्य आरोपों में अपना दोष स्वीकार कर लिया था।

एनआईए ने की मौत की सजा की मांग
सजा के खिलाफ अपील करते हुए, एनआईए ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी आतंकवादी को केवल इसलिए आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और मुकदमा नहीं चलाने का विकल्प चुना है। मौत की सजा की मांग करते हुए एनआईए ने कहा है कि अगर ऐसे खूंखार आतंकवादियों को सिर्फ इसलिए मौत की सजा नहीं दी जाती, क्योंकि उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, तो सजा नीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। ऐसे में आतंकवादियों के पास मौत की सजा से बचने का एक रास्ता बच जाएगा।

एनआईए ने कहा कि आजीवन कारावास की सजा आतंकियों के अपराध के अनुरूप नहीं है। खासकर तब, जब देश और सैनिकों के परिवारों को जान का नुकसान हुआ है और ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष है कि मलिक के अपराध दुर्लभतम में से दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आते हैं। एजेंसी ने इस बात पर जोर दिया है कि यह उचित संदेह से परे साबित हो चुका है कि मलिक ने घाटी में आतंकवादी गतिविधियों का नेतृत्व किया और खूंखार विदेशी आतंकी संगठनों की मदद से घाटी में सशस्त्र विद्रोह की साजिश रच रहा था।

ऐसे खूंखार आतंकी को मृत्युदंड न देना न्याय का गर्भपात होगा
एजेंसी ने कहा कि ऐसे खूंखार आतंकवादी को मृत्युदंड न देने से न्याय का गर्भपात हो जाएगा। क्योंकि, आतंकवाद का एक कृत्य समाज के खिलाफ ही अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के खिलाफ अपराध है। दूसरे शब्दों में यह बाहरी आक्रमण, युद्ध का कृत्य और राष्ट्र की संप्रभुता का अपमान है।
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