कोर्ट ने सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा
निचली अदालत ने 24 मई, 2022 को मलिक को कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और आईपीसी के तहत विभिन्न अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मलिक ने आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए सहित अन्य आरोपों में अपना दोष स्वीकार कर लिया था।
एनआईए ने की मौत की सजा की मांग
सजा के खिलाफ अपील करते हुए, एनआईए ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी आतंकवादी को केवल इसलिए आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और मुकदमा नहीं चलाने का विकल्प चुना है। मौत की सजा की मांग करते हुए एनआईए ने कहा है कि अगर ऐसे खूंखार आतंकवादियों को सिर्फ इसलिए मौत की सजा नहीं दी जाती, क्योंकि उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, तो सजा नीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। ऐसे में आतंकवादियों के पास मौत की सजा से बचने का एक रास्ता बच जाएगा।
एनआईए ने कहा कि आजीवन कारावास की सजा आतंकियों के अपराध के अनुरूप नहीं है। खासकर तब, जब देश और सैनिकों के परिवारों को जान का नुकसान हुआ है और ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष है कि मलिक के अपराध दुर्लभतम में से दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आते हैं। एजेंसी ने इस बात पर जोर दिया है कि यह उचित संदेह से परे साबित हो चुका है कि मलिक ने घाटी में आतंकवादी गतिविधियों का नेतृत्व किया और खूंखार विदेशी आतंकी संगठनों की मदद से घाटी में सशस्त्र विद्रोह की साजिश रच रहा था।
ऐसे खूंखार आतंकी को मृत्युदंड न देना न्याय का गर्भपात होगा
एजेंसी ने कहा कि ऐसे खूंखार आतंकवादी को मृत्युदंड न देने से न्याय का गर्भपात हो जाएगा। क्योंकि, आतंकवाद का एक कृत्य समाज के खिलाफ ही अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के खिलाफ अपराध है। दूसरे शब्दों में यह बाहरी आक्रमण, युद्ध का कृत्य और राष्ट्र की संप्रभुता का अपमान है।