नेताजी की किस्मत ईवीएम में बंद होने के साथ ही लोगों के बीच परिणाम और नयी सरकार की चुनावी चकल्लस शुरू हो गई। सट्टा लगना शुरू हो गया। वोट डालने के बाद हर जगह जीत-हार को लेकर चर्चा जारी रही।
किसी ने कांग्रेस को जिताया, किसी ने भाजपा, इनेलो और बसपा तो किसी ने निर्दलियों पर भरोसा किया। कोई जातीय समीकरण लगा रहा था, कोई व्यक्तिगत छवि तो कोई पार्टी को आधार बनाकर प्रत्याशियों को हरवा-जिता रहा था।
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चाय और पान की दुकानों पर सबसे अधिक चुनावी चर्चाएं चलती रहीं। शाम को जब लोग पार्कों में आए तो वहां चुनाव के अलावा और कोई बात नहीं हुई। सबसे ज्यादा चर्चा युवा वोटरों को लेकर रही। राजनीतिक विश्लेषकों का साफ कहना है कि इस बार युवा वोटर निर्णायक फैक्टर हैं।
फरीदाबाद-पलवल में 18 से 39 वर्ष तक के करीब 10 लाख वोटर हैं, जिनके अंदर बदलाव की सबसे ज्यादा छटपटाहट है। इनमें से अधिकांश वोट बदलाव के लिए पड़े होंगे। वोट देने वाले युवाओं का साफ कहना था कि वे बडे़ बदलाव के हिमायती हैं।
रोजगार को लेकर काफी युवाओं में मौजूदा सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा दिखा और वह साफ तौर पर कहते नजर आए कि उन्होंने किसको वोट डाला। लोगों का कहना है कि जीत-हार के फासले का फैसला यही युवा वोटर ही तय करेंगे।
जब वोटर बूथ से बाहर निकले तो लोगों ने पूछा किसको मत दिया। किस प्रत्याशी को कितने मत मिलेंगे इसका अनुमान कार्यकर्ता कागज-पेन लेकर लगाते देखे गए। कई जगह पर समीकरणों को लेकर लोग बहस करते हुए भी देखे गए।
पंजाबी, वैश्य, जाट, गुर्जर, मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाता किस ओर गए इसको लेकर गुणा-भाग ज्यादा हुआ। विभिन्न पार्टियों के नेता भी इधर-उधर फोन मिलाकर एक दूसरे के खेमे में स्थिति का पता लगाने की जुगत लगाते रहे।