- जवाब पता होने के बावजूद कक्षा में बोलने से कतराते हैं बच्चे, मजाक उड़ाए जाने का रहता है डर
संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। हकलाने की समस्या के कारण कई बच्चों का आत्मविश्वास प्रभावित होता है। वे स्कूल या सार्वजनिक जगहों पर अपनी बात रखने, कक्षा में सवालों के जवाब देने और दूसरे बच्चों से बातचीत करने में झिझक महसूस करते हैं। कई बार जवाब पता होने के बावजूद मजाक उड़ाए जाने के डर से चुप रहना पसंद करते हैं। इससे उनकी पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी प्रभावित हो सकती है। हर साल 22 अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय हकलाना जागरूकता दिवस पर इस समस्या के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हकलाने वाले बच्चे बोलते समय किसी शब्द या आवाज को बार-बार दोहरा सकते हैं, आवाज खींच सकते हैं या अचानक रुक सकते हैं। ऐसे बच्चों के साथ भेदभाव करने के बजाय उन्हें सहज माहौल देना चाहिए। उनकी बोलने की शैली की नकल करना या मजाक उड़ाना उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। जरूरत पड़ने पर स्पीच थेरेपिस्ट की मदद ली जा सकती है।
बच्चों का मजाक उड़ाने के बजाय बढ़ाएं हौसला-
शिक्षकों का कहना है कि हकलाने वाले बच्चों को अपनी बात पूरी करने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए। उनकी बात बीच में काटने या जल्दी बोलने का दबाव बनाने से बचना चाहिए। अभिभावकों और शिक्षकों के सहयोग से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाया जा सकता है। कक्षा में ऐसा माहौल जरूरी है, जहां हर बच्चा बिना डर के अपनी बात रख सके।
केस-1 : धीरे-धीरे कम हुई हकलाने की समस्या-
लक्ष्मण विहार निवासी 10 वर्षीय आर्यन बचपन से स्पष्ट बोलने में परेशानी का सामना कर रहा था। हकलाने के कारण उसे सार्वजनिक जगहों पर बोलने से डर लगता था। हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ उसकी समस्या में धीरे-धीरे कमी आई है। अब वह पहले की तुलना में बेहतर तरीके से बोल पाता है।
शिक्षकों ने साझा किए अनुभव -
राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, जैकमपुरा की शिक्षिका अनुराधा ने कहा कि बच्चों को अपनी बात पूरी करने का समय देना चाहिए। उनका मजाक उड़ाने के बजाय हौसला बढ़ाना जरूरी है। इससे वे कक्षा में बिना डर के बोल सकेंगे।
राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सेक्टर-4-7 के प्रधानाचार्य अशोक ने बताया कि वर्ष 2020 में उनके स्कूल में भी हकलाने वाला एक बच्चा था। उसे प्यार और समझ के साथ प्रोत्साहित किया गया। शिक्षकों और अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि बच्चों को सहज माहौल दें।
ऑक्सफोर्ड से प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक नयोनिका आलोक ने बताया कि स्कूलों में ऐसे बच्चे मिलते हैं, जो मजाक उड़ाए जाने के डर से जवाब जानते हुए भी नहीं बोलते। लगातार परेशानी होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।