मनरेगा के तहत रोजगार दिलाने को सरकार भले ही प्रतिबद्ध हो।लेकिन नुमाइंदों की दलील अलग है। विभाग के ही एक कर्मी ने बताया कि बाहर किसी भी मजदूर को 350 से 400 रुपये तक मजदूरी मिलती है। सरकार केवल 182 रुपये प्रतिदिन के दे रही है। इसलिए ही मजदूर योजना के प्रति आकर्षित नहीं होते। न ही पंजीकृत करा पाते।
विभाग की दूसरी दलील गांव कम होने की है। कर्मी ने बताया कि कुछ साल पहले तक गांवों की संख्या 200 पार थी। प्राधिकरण क्षेत्रों का दायरा बढ़ा तो गांवों की संख्या सिमटकर 88 रह गई है। गांव कम होने के साथ ही मजदूरों की संख्या भी कम हो गई। वहीं सूत्रों ने बताया कि योजना को लेकर अधिकारी-कर्मचारी ही गंभीर नहीं है। दादरी, जेवर, दनकौर, बिलासपुर, रबुपूरा आदि क्षेत्रों के 88 गांवों में योजना को लेकर न तो खास प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। न कैंप का आयोजन अफसर कराते हैं। जिला स्तर पर आंकड़ों में बाजीगरी कर योजना का क्रियान्वयन चल रहा है।
वहीं जिला नगरीय विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक नीरज कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि गांव कम होने से मजदूरी पर प्रभाव पड़ा है। मजदूर पैसे कम भी बताते हैं। इसको लेकर शासन स्तर पर वार्ता की गई है। योजना के क्रियान्वयन में पूरी गंभीरता बरती जा रही है।