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साहब, 22 रुपये में मजदूरों का पेट नहीं भरता, डीआरडीए के आंकड़ों में खुली मनरेगा की पोल  

Fri, 22 Nov 2019 08:49 PM IST
Trainee Trainee गौरव शर्मा, अमर उजाला, ग्रेटर नोएडा
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मजदूर
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महात्मा गांधी नेशनल एंपलॉय गारंटी एक्ट (मनरेगा) का नाम ही रोजगार की गारंटी है। लेकिन गौतमबुद्धनगर में सरकार की यही गारंटी दम तोड़ गई। जिला नगरीय विकास अभिकरण(डीआरडीए)  कार्यालय की समीक्षा में योजना के क्रियान्वयन की पोल खुलकर सामने आ गई है। अप्रैल 2019 से 22 नवंबर 2019 तक मजदूर को औसतन हर दिन 22 रुपये का रोजगार दिया गया। सवाल है कि इतने कम पैसे में मजदूर कैसे अपना घर चलाएगा और कैसे अपना पेट भरेगा? 

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 केंद्र सरकार की योजना मनरेगा में पंजीकृत मजदूरों को 100 दिन काम देना होता है। मजदूर को एक दिन के काम के बदले 182 रुपये देने होते हैं। ग्राम पंचायत, ब्लॉक या फिर जिला स्तर पर पंजीकृत मजदूरों को काम दिलाने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की होती है। गौतमबुद्धनगर जिले में पंजीकृत सक्रिय जॉब धारकों (मजदूरों) की संख्या 1207 है।

विभागीय अफसरों के स्तर से अप्रैल 2019 से 22 नवंबर 2019 तक का रिकार्ड खंगाला तो योजना की स्याह असलियत खुलकर सामने आ गई। अभी तक 578 मजदूरों को 13136 दिन काम मिला है। खुद अफसरों ने ही औसतन कमाई निकाली तो 22 रुपये हर दिन रही। आंकड़ों के मुताबिक, गतवर्ष भी योजना की कमोबेश यही हालत रही। 

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400 रुपये लेते हैं मजदूर

मनरेगा के तहत रोजगार दिलाने को सरकार भले ही प्रतिबद्ध हो।लेकिन नुमाइंदों की दलील अलग है। विभाग के ही एक कर्मी ने बताया कि बाहर किसी भी मजदूर को 350 से 400 रुपये तक मजदूरी मिलती है। सरकार केवल 182 रुपये प्रतिदिन के दे रही है। इसलिए ही मजदूर योजना के प्रति आकर्षित नहीं होते। न ही पंजीकृत करा पाते।
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योजना के प्रचार पर नहीं है ध्यान

विभाग की दूसरी दलील गांव कम होने की है। कर्मी ने बताया कि कुछ साल पहले तक गांवों की संख्या 200 पार थी। प्राधिकरण क्षेत्रों का दायरा बढ़ा तो गांवों की संख्या सिमटकर 88 रह गई है। गांव कम होने के साथ ही मजदूरों की संख्या भी कम हो गई। वहीं सूत्रों ने बताया कि योजना को लेकर अधिकारी-कर्मचारी ही गंभीर नहीं है। दादरी, जेवर, दनकौर, बिलासपुर, रबुपूरा आदि क्षेत्रों के 88 गांवों में योजना को लेकर न तो खास प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। न कैंप का आयोजन अफसर कराते हैं। जिला स्तर पर आंकड़ों में बाजीगरी कर योजना का क्रियान्वयन चल रहा है। 

वहीं जिला नगरीय विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक नीरज कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि गांव कम होने से मजदूरी पर प्रभाव पड़ा है। मजदूर पैसे कम भी बताते हैं। इसको लेकर शासन स्तर पर वार्ता की गई है। योजना के क्रियान्वयन में पूरी गंभीरता बरती जा रही है। 
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