डॉक्टरों के अनुसार, लिंग परिवर्तन करने से पहले एक साल तक संबंधित व्यक्ति या महिला का रिअसाइनमेंट में रहना जरूरी होता है। ऐसा इसलिए ताकि लिंग परिवर्तन कर वह जो बनना चाहती या चाहता है उसे कम से कम सर्जरी से पहले वह महसूस करना शुरू करें, क्योंकि यह सर्जरी एक बार की प्रक्रिया है। इसके बाद कोई विकल्प नहीं बचता। रिअसाइनमेंट के साथ साथ कम से कम दो मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग करते हैं। इनकी सिफारिश पर ही ऑपरेशन करने या न करने का निर्णय होता है। अगर प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो हारमोनल ट्रीटमेंट छह माह तक चलता है। हालांकि लिंग परिवर्तन सर्जरी पीड़ादायक हो सकती है लेकिन अगर सही तरीके से यह की जाए तो आगे बहुत ज्यादा इलाज बगैरह की जरूरत नहीं पड़ती।
लिंग परिवर्तन को लेकर जब दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जानकारी ली गई तो पता चला कि मौजूदा समय में लिंग परिवर्तन सर्जरी को लेकर राजधानी में कोई नियम-कानून नहीं है। लोकनायक अस्पताल ने अपने स्तरपर नियम बनाए हैं। जबकि प्राइवेट अस्पताल अपने दिशा निर्देशों पर काम कर रहे हैं। जबकि बिहार में मुख्यमंत्री राहत कोष से 1.50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की जाती है।
आईने को देखकर हमेशा झूठ जिया है मैंने, आज जब बन गई हूं औरत, जीने का जज्बा जागा है मन में।’’ ये कहना है महाराष्ट्र के नांदेड़ निवासी सानवी जेठवानी का, जिन्होंने हाल ही में दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में लिंग परिवर्तन कराया। एक सवाल पर उन्होंने कहा कि सर्जरी के पहले तक काफी खुशी थी। इस बीच थोड़ा डर भी था। सर्जरी के बाद पहला और दूसरा दिन काफी कठिन था लेकिन तब मैं सोचती थी कि कुछ ही दिन की तकलीफ है। जब मैंने 30 साल तकलीफ सहन की है तो कुछ और दिन सहने के बाद मुझे नया जीवन मिल रहा है। उन्होंने दिल्ली की स्थिति को लेकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट से अधिकार मिलने के बाद भी हमारी सरकारें अब तक ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर गंभीर नहीं हैं। सरकारों को अपने अस्पतालों में इस पर जोर देना चाहिए। समाज के साथ साथ सरकारों के जहन में भी ‘ट्रांस’ शब्द बैठा हुआ है जिसे सुनते ही हमें सड़कों पर ताली बजाने वालों की तस्वीर दिखाई देती है।