बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके लालू प्रसाद यादव के समधी और दामाद अब तक छह बार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं, लेकिन उन्हें विधानसभा पहुंचने का मौका नहीं मिला है। सिकंदराबाद से गठबंधन प्रत्याशी और लालू यादव के दामाद राहुल यादव दो बार तो उनके पिता और लालू यादव के समधी जितेंद्र यादव चार बार चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन हर बार चुनाव का परिणाम एक जैसा ही रहा है।
मूलरूप से गाजियाबाद निवासी जितेंद्र यादव वर्ष 1997 से राजनीति में सक्रिय हैं। पहली बार वर्ष 1997 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गाजियाबाद से मैदान में उतरकर अपनी किस्मत आजमाई थी। इस दौरान जनता ने उन्हें समर्थन नहीं दिया और हार झेलनी पड़ी थी।
इसके बाद वर्ष 2002 में सपा का दामन थामा और साइकिल पर सवार होकर विधानसभा चुनाव तो लड़ा, लेकिन परिणाम 1997 के चुनाव जैसा ही रहा। इसके बाद भी जितेंद्र यादव को उम्मीद थी कि वह विधानसभा अवश्य पहुंचेंगे।
वर्ष 2007 और फिर 2012 में विधानसभा पहुंचने की उम्मीद लिए वह गाजियाबाद छोड़कर बुलंदशहर की सिकंदराबाद सीट पर पहुंचे और चुनाव लड़ा, लेकिन यहां की जनता ने भी उन्हें नकार दिया। इसी समयावधि में उनके बेटे राहुल यादव का विवाह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी के साथ हो गया। इसके बाद प्रदेश में सपा सरकार के कार्यकाल में जितेंद्र यादव को एमएलसी बनाया गया।
इसके बाद जितेंद्र यादव को उम्मीद थी कि शायद विधानसभा उनके नसीब में नहीं, जिसके चलते 2017 में उन्होंने अपने बेटे राहुल यादव को सिकंदराबाद से सपा की साइकिल पर सवार कर मैदान में भेजा। इस बार भी जनता ने साइकिल पर बैठे राहुल को नकार दिया। 2022 में फिर से विधानसभा जाने और गठबंधन की लहर होने का दम भरते हुए वह फिर से किस्मत आजमाने सिकंदराबाद पहुंचे, लेकिन इस बार भी स्थिति नहीं बदली।
सपा-रालोद-एनसीपी गठबंधन का हर आंकड़ा हुआ फेल
जिले की सात विधानसभा सीटों पर गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा और जीत के लिए हर संभव आंकड़ेबाजी की, लेकिन वह मतदाताओं पर अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहे। सिकंदराबाद, डिबाई और खुर्जा से सपा ने जबकि, बुलंदशहर, स्याना और शिकारपुर से रालोद ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। वहीं, अनूपशहर सीट को गठबंधन के तहत एनसीपी के खाते में दिया गया था। गठबंधन को उम्मीद थी कि सपा के साथ मिलकर वह विभिन्न जाति के मतदाताओं को रिझाने में सफल रहेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और रालोद के हाथ से जिले में जीत का खाता खोलने का एक और मौका निकल गया।