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Ghaziabad News: अजनबी के खून से जुड़ रही जिंदगी की डोर, कोई 120 तो कोई 117 बार कर चुका रक्तदान

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गाजियाबाद। खून का रिश्ता हमेशा जन्म से नहीं बनता। कभी किसी अनजान व्यक्ति की नसों में बहता रक्त किसी दूसरे के शरीर में पहुंचकर जिंदगी की डोर थाम लेता है। देने वाला चेहरा नहीं जानता और पाने वाला नाम नहीं जान पाता, फिर भी दोनों के बीच ऐसा संबंध बन जाता है, जिसे कोई पहचान नहीं चाहिए। गाजियाबाद में ऐसे कई रक्तदाता हैं, जो वर्षों से इसी भावना के साथ जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं। एक अक्तूबर को राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस के अवसर पर ऐसे ही रक्तदाताओं की सेवा मिसाल बनकर सामने आती है।



120 बार रक्तदान कर चुके हैं डॉ. डोगरा



वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अरविंद डोगरा चिकित्सा सेवा के साथ रक्तदान के लिए भी पहचाने जाते हैं। वह अब तक 120 बार रक्तदान कर चुके हैं। उनका रक्त समूह ए नेगेटिव है, जो अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है। ऐसे में जरूरत के समय इस समूह का रक्त जुटाना कई बार चुनौती बन जाता है। डॉ. डोगरा बताते हैं कि मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान जब किसी डॉक्टर के परिवार के सदस्य को रक्त की जरूरत पड़ती थी, तो पूरे छात्रावास में घोषणा कराकर रक्तदाता तलाशे जाते थे। वहीं से उनके मन में रक्तदान की भावना मजबूत हुई। उस समय रक्तदान करने वाले विद्यार्थियों को खुले हृदय की शल्य चिकित्सा देखने का अवसर भी मिलता था। सेवा के साथ चिकित्सा सीखने का यह अनुभव उन्हें काफी आकर्षित करता था। इसके बाद रक्तदान उनके जीवन का नियमित हिस्सा बन गया। उनका कहना है कि रक्तदान को लेकर आज भी लोगों के मन में कई भ्रांतियां हैं। इन्हें दूर करने और लोगों को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए प्रेरित करने का काम वह लंबे समय से कर रहे हैं।
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प्रिंटर की मरम्मत से परिवार चलता है, रक्तदान से बचती हैं जानें



ओडिशा के रहने वाले नागेंद्रनाथ श्यामल अब तक 117 बार रक्तदान कर चुके हैं। ओ पॉजिटिव ग्रुप वाले श्यामल पिछले 38 वर्षों से भट्ठा नंबर पांच में रह रहे हैं। वह परिवार का खर्च प्रिंटर की मरम्मत का काम करके चलाते हैं। माता-पिता की याद में ओडिशा में बाइक एंबुलेंस का संचालन भी करवा रहे हैं। श्यामल ने जरूरतमंदों तक रक्त पहुंचाने के लिए युवाओं का एक समूह बनाया है। इसमें खासकर दुर्लभ रक्त समूह वाले लोगों को जोड़ा गया है। किसी मरीज को रक्त की आवश्यकता होने पर सूचना साझा की जाती है और उपलब्ध दाता अस्पताल पहुंचकर रक्त देते हैं। श्यामल का कहना है कि किसी अनजान परिवार के सदस्य की जान बचाने का संतोष ही उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है।
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