जिस पृथ्वी को माता मानकर पूजा करने का उपदेश वेदों-ऋषियों ने दिया है, आज वह लोगों की करनी से बदहाल है। प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण धरती का मूल स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। हरियाली घट रही है और जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं।
भूजल दोहन और गगनचुंबी इमारतों के खड़े होने से लगातार भूकंप आने लगे हैं। सूखा और बाढ़ के रूप मे पृथ्वी लोगों के हस्तक्षेप का विरोध कर चेतावनी देने लगी है।
प्रकृति के साथ बढ़ते हस्तक्षेप से अब धरती पर ही संकट बढ़ता जा रहा है।
वनाच्छादन क्षेत्र 33 फीसदी से घटकर मात्र 9 फीसदी रह गया है। हरियाली उजाड़ने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कारखानों से निकलने वाले कार्बन और हानिकारक गैसों के चलते ओजोन परत पर खतरा बढ़ रहा है।
कार्बन डाईऑक्साइड गैस की मात्रा बढ़ने से वातावरण प्रदूषित हो रहा है। इससे तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। कंक्रीट के जंगल बढ़ने से वाटर रिचार्ज कम हो रहा है। जल दोहन बढ़ने से ग्राउंड वाटर लेबल लगातार गिर रहा है। कीटनाशकों और रसायनों के बढ़ने से उर्वरा शक्ति घट रही है।
ऐसे में धरती के अंदर उथल-पुथल शुरू हो गई है। भूगर्भ में प्लेटों में खिंचाव आने से लगातार भूकंप आने लगे हैं। जिला वन अधिकारी डा. जोगा सिंह का कहना है कि पृथ्वी के स्वरूप में आ रहे बदलाव से बड़ा संकट आने वाला है।
इसके लिए तत्काल जागरूक होने की जरूरत है। पृथ्वी अपने साथ हो रहे हस्तक्षेप को ज्यादा सहन करने की स्थिति में नहीं है। प्रमुख पर्यावरण वैज्ञानिक डा. विवेकराज सिंह का कहना है कि अब लोगों को हरियाली और जल संचय बढ़ाने के लिए तत्काल खड़ा होना होगा।
प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करना होगा। ग्लेशियरों की स्थिति में बदलाव आया तो धरती भी नहीं बचेगी। इसके लिए सामाजिक संगठनों को शासन-प्रशासन के साथ मिलकर अभियान चलाना होगा।