आदेश के बावजूद तालाबों से अवैध कब्जे न हटाए जाने पर एनजीटी ने बृहस्पतिवार को सख्ती की है। एनजीटी ने इस मामले में प्रमुख सचिव के खिलाफ समन जारी किया है। अब अगली सुनवाई पर प्रमुख सचिव को एनजीटी में पेश होकर जवाब दाखिल करना होगा।
वहीं, डूब क्षेत्र में बने हज हाउस के प्रकरण में उन्होंने सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। ऐसा न करने पर 50 हजार का जुर्माना भरने के आदेश दिए हैं।
बृहस्पतिवार को एनजीटी में तालाब से अतिक्रमण हटाए जाने, डूब क्षेत्र में बने हज हाउस और भूजल दोहन पर प्रतिबंध लगाए जाने के मामलों में सुनवाई हुई।
तीनों ही मामलों में गाजियाबाद के सोशल एक्टिविस्ट सुशील राघव और आकाश वशिष्ठ की ओर से जनहित याचिका दाखिल की गई थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तालाबों से अवैध कब्जे हटाने और निर्धारित अंतराल पर स्टेटस रिपोर्ट एनजीटी में दाखिल करने के आदेश कर चुका है।
बावजूद इसके शासन की ओर से इस पर कार्रवाई नहीं हो रही। इस मामले में एनजीटी ने प्रमुख सचिव को समन जारी किया है। याचिकाकर्ता के एडवोकेट राहुल चौधरी ने बताया कि अगली सुनवाई पर प्रमुख सचिव को एनजीटी में पेश होकर जवाब दाखिल करना है।
उन्होंने बताया कि डूब क्षेत्र में बने हज हाउस मामले में यूपी सरकार की ओर से स्टेटस रिपोर्ट फाइल की जानी थी, लेकिन नहीं की गई। इस मामले में एनजीटी ने एक सप्ताह में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए हैं। रिपोर्ट फाइल न किए जाने पर सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
वहीं याचिकाकर्ता सुशील राघव का कहना है कि भूजल दोहन पर प्रतिबंध लगाने के आदेश पर कई फैक्ट्रियों को नोटिस जारी किए गए हैं। बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान कंपनियों की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने बोरवेल सील न करने की याचिका की।
उन्होंने दलील दी कि कंपनियों में पानी का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। ऐसे में कंपनियां बंद हुई तो उनके काम करने वाले कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे। कंपनियों की ओर से इस मामले में दो सप्ताह का समय मांगा गया था।
एनजीटी ने समय देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि संबंधित क्षेत्र में पहले से ही भूजल का अतिदोहन किया जा चुका है। एनजीटी ने सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथॉरिटी से रिपोर्ट मांगी है।