नई मस्जिद के सामने जुमे की नमाज अदा करते मुस्लिम बंधु।
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मसूरी कस्बे की दूसरी ऐतिहासिक मस्जिद है मरकज वाली जामा मस्जिद। यह मस्जिद मुगल कालीन स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है।
क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके बुजुर्गों के अनुसार यह मस्जिद 1851 बनाई गई थी। उस वक्त मकान तो क्या, चूल्हे में भी पक्की ईंट लगाने पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगाई हुई थी। इसके बावजूद यह मस्जिद पक्की ईंटों (लखोरी) से बनाई गई थी। इसकी तामीर में अंग्रेजों ने भी हिस्सा लिया था।
मस्जिद में मुगल कालीन कला की महराबें बनी हुई हैं और लंबी गुबंद भी है। उस समय मस्जिद में एक कुआं था, जो दो हिस्सों में बांटा गया था। बाहर काहिस्सा गांव वालों के लिए था, जिससे वह पीने का पानी ले जाते थे। अंदर के हिस्से से नमाजी वुजू के लिए पानी लेते थे। मस्जिद में सीमेंट की टंकी बनाई हुई थी, जिसे तब तकावा बोलते थे। सर्दियों में वुजू के लिए पानी को गर्म करने के लिए तकावा में पानी भरकर नीचे आग जलाई जाती थी, जिससे पानी गर्म हो जाता था। 1960 के आसपास इस कुएं को बंद कर दिया गया था।
100 बरस पार कर चुके गांव के सबसे बुजुर्ग हाजी माशूक अली ने बताया कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना था कि अपनी स्थापत्य के समय यह मस्जिद करीब 50 गज में ईंट और चूने से बनाई गई थी। उस वक्त गांव की आबादी करीब 800 रही होगी। तब मस्जिद में एक साथ 50-60 नमाजी ही आ सकते थे। 1911 में यहां इमाम के रहने के लिए एक हुजरा बनाया गया था और वर्ष 1946 में बरामदे का निर्माण कराया गया था। अब यह करीब 200 गज में है, जिसमें तकरीबन 300 लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं।
जुमे की नमाज भी यहां पढ़ी जाती है। मरकज मस्जिद के इमाम हाफिज उस्मान बताते हैं कि आबादी के हिसाब से उस वक्त नमाजी ज्यादा थे। अब आबादी ज्यादा है, लेकिन उस लिहाज से नमाजी कम हैं।