खेती छूटी, मकानों के किराए के सहारे चल रही जिंदगी
साहिबाबाद। इंदिरापुरम की ऊंची अटारियों के बीच बसा मुगलकालीन गांव मकनपुर ने आजादी से अब तक के 75 साल में कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे। आजादी के करीब तीन दशक बाद तक इस गांव का रकबा 52 हजार बीघा था, इसलिए इसे बावनी के नाम से भी बुलाते थे। तब यहां का मुख्य व्यवसाय खेती व पशुपालन था। अब यहां पक्के मकान व हाईराइज बिल्डिगें नजर आती हैं। यहां के मूल निवासियों की खेती छूट गई तो अब मकानों के किराए के सहारे अपनी जीविका चला रहे हैं। मकनपुर का पूर्व नाम मख्खनपुर था। इसका क्षेत्रफल इंदिरापुरम, वसुंधरा, वैशाली का कुछ हिस्सा और नोएडा के सेक्टर 62 तक फैला था। प्राधिकरणों ने 1990 में गांव की जमीन इंदिरापुरम के लिए अधिग्रहित कर ली थी।
1947 में गांव में आजादी का जश्न मना था। दरअसल लखनऊ की तरफ से दिल्नी जाने वाले अंग्रेज गांव स्थित मकबरे को सराय की तरह इस्तेमाल करते थे। अंग्रेजों के रोज-रोज के दीदार इन्हें मुक्ति मिली थी। आजादी के समय इसी मकबरे के आसपास गांव के डेढ़ सौ से दो सौ घर थे तब गांव की आबादी करीब एक हजार थी। आजादी के बाद रहन-सहन में बदलाव होता चला गया। साठ की दशक तक ग्रामीणों ने अपने ही संशाधनों से बुनियादी जरूरतें पूरी की। बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी के दो साल बाद ही एक प्याऊ यहां बनाया गया था, जिसका पानी मीठा होता था। इसके अलावा गांव में नौ कुएं थे। बैलों के रहट से मात्र 20 फुट नीचे से पानी निकाला जाता था। पीने के लिए इसका इस्तेमाल साठ के दशक तक होता रहा। 1972 में सिंगल लेन लिंक रोड इसी गांव की जमीन पर बनी। इससे दिल्ली जाने के लिए एक सड़क मिल गई। उसी दौरान बोरिंग कर जमीन से पानी निकालने का तकनीक आया। इसके उपयोग से खेतों के लिए पानी की उपलब्धता पूरी हो गई। खास यह है कि सत्तर के दशक में ही यूपीएसआईडी ने इनकी जमीन का अधिग्रहण शुरू कर दिया था। इनकी जमीन मात्र 13 रुपया बीघा के हिसाब से ली गई।
नब्बे के दशक में छूटा गांव, मिला शहर
नब्बे के दशक में इस गांव में बड़ा बदलाव आया। 1990 तक गांव की सड़कें कच्ची थीं। इस दौरान 90 रुपये प्रति गज के हिसाब से इंदिरापुरम की जमीन अधिग्रहित होने के बाद पक्की सड़क का निर्माण शुरू हुआ। 1995-96 में गांव में कच्चे मकानों को लोगों ने पक्का करना शुरू कर दिया। दरअसल खेती खत्म हो गई। मुआवजा से आर्थिक लाभ होने पर ग्रामीणों ने अपने घर दो-तीन मंजिल के बनाने लगे। सलीम सैफी कहते हैं कि गेेहूं, चना, मटर, जौ, सरसों की खेती और पशुपालन से लंबे समय तक चलने वाली आजीविका खत्म हो गई। प्राय: लोगों ने किराए के लिए दो तीन मंजिला घर बना लिए तब से यह आजीविका का मुख्य साधन बना है। आज गांव की आबादी करीब 50 हजार है। आसपास फैक्टरियों में भी रोजगार मिलने लगा। स्थानीय पार्षद कपिल त्यागी का कहना है कि हाल के वर्षों में पांच फुट से लेकर 30 फुट तक की सड़कें बनीं।
1962 में 42 रुपये में आई गांव में पहली साइकिल
आजादी के करीब चार दशक बाद तक गांव में पगडंडीनुमा सड़कें थीं। 1960 में मणिराम त्यागी पहली साइकिल गांव में लाए। मणिराम के 76 वर्षीय पुत्र धनप्रकाश ने बताया कि उनके पिता ने यह साइकिल दिल्ली के बाजार से 42 रुपये में खरीदी थी। 1962 में पहली मोटरसाइकिल खरीदने वाले इसामुद्दीन थे। इसी दौरान राजी त्यागी ने पहली कार खरीदी थी। जब बोरिंग की मशीनें आईं तब ट्रैक्टरों की संख्या बढ़ी। वहीं नब्बे के दशक में गांव वालों को टेलीफोन की सुविधा मिली।
यहां दूसरा स्कूल नहीं बन सका
आजादी के समय से ही गांव में एक प्राइमरी स्कूल था। पांचवीं से आगे की पढ़ाई के लिए गांव से 17 किमी दूर गाजियाबाद के स्कूलों में जाते थे। इंदिरापुरम के विकास के साथ ही गांव के आसपास शिक्षण संस्थाओं की सुविधाएं मिलीं, लेकिन गांव में दूसरा स्कूल आज तक नहीं खुला।
- धनप्रकाश त्यागी
सघन इलाके से बीमारी का खतरा
अस्सी के दशक तक गांव में मोर नाचते थे। पशु-पक्षियों की चहचहाहट थी। सभी स्वस्थ रहते थे। मकानों के बनने से इलाका सघन हुआ तो गंदगी के साथ बीमारियां फैलने लगीं।
- हरेश्वर त्यागी
पाइपलाइन बिछाई पर पानी नहीं आया
सन 2000 में सप्लाई वाटर मिलने की उम्मीद थी। कुछ इलाकों में पाइपलाइन बिछाई गई थी, लेकिन पानी आज तक नहीं आया। सीवर सुविधा भी नहीं मिली। यहां तक कि गांव को श्मशान तक के लिए जगह नहीं मिली।
- भौर सिंह
तालाबों की हालत भी बुरी
बहुमंजिली इमारतों से मकनपुर गांव घिर गया है, सो ढाई दशक से सूर्योदय-सूर्यास्त नहीं दिखा। अब मीठा पानी भी नहीं मिलता। सारे कुएं ढक दिए गए। गांव के वर्षो पुराने तालाब को भी संवारा नहीं गया।
- अमन निशा