बहन के लिए मां-बाप का फर्ज भी निभा रहा भाई
गाजियाबाद। राखी का वचन निभाना कोई अक्षांश से सीखे। कोरोना की दूसरी लहर में अनाथ हो चुका यह बीटेक पास नौजवान छोटी बहन अक्षिता के लिए मां-बाप का फर्ज भी निभा रहा है। खुद के लिए नौकरी की तलाश बाद में शुरु की, पहले बहन का 12 वीं में दाखिला कराया। बहन का सपना डॉक्टर बनना है, इसलिए कोचिंग भी करा रहा है। कभी मां की तरह उसके लिए कपड़े खरीदकर लाता है तो कभी पिता की तरह फीस भरने के लिए स्कूल जाता है। दोनों की मां-बाप की याद आती है तो अपना गम छिपाकर बहन के आंसू पोंछता है। रोते-रोते बहन सवाल करती है, जिंदगी कैसे कटेगी? आगे क्या होगा? भाई का एक ही जवाब होता है, तू फिक्त्रस् क्यों करती है, मैं हू ना।
वैशाली के निवासी इन भाई-बहन के सिर से मां-बाप का साया दो दिन के भीतर उठ गया था। 23 अप्रैल को पिता गंभीर सिंह बालियान ने कोरोना से दम तोड़ा तो 23 को मां मधुबाला भी दुनिया छोड़ गईं। पिता निजी कंपनी में इंजीनियर थे और मां लोनी ब्लॉक के निस्तौली गांव के प्रथामिक विद्यालय में अध्यापक। 23 साल के अक्षांश और 16 की अक्षिता अनाथ हो गए। ऐसे में अकांक्ष ने फैसला लिया कि वह अक्षिता के सपने पूरे करेगा। उसने उसका दिल्ली के स्कूल में दाखिला कराया। उसकी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग भी शुरु कराई।
पढ़ाई के लिए पैसे की जरूरत होती है तो मदद बिजनौर निवासी नाना से मिलती है। अक्षांश का कहना है कि बहन पढ़ाई में होशियार है। कोरोना ने गहरे जख्म दिए हैं। यह उसकी हिम्मत है कि पढ़ाई में मन लगा रही है। उसके सपने सच होने जरूरी हैं, यही मम्मी-पापा चाहते थे। इसलिए कोशिश है कि उसे किसी चीज की कमी न रहे।
बातें करने से मन हलका होता है
अक्षांश बताते हैं कि हम एक दूसरे से बातें करते हैं तो मन हलका हो जाता है। बहन को कोई परेशानी होती है, तो वह बेझिझक बता देती है। मैं भी ऐसा ही करता हूं। हम एक दूसरे का सहारा है।
जो कहेगी, वही उपहार दूंगा
अक्षांश का कहना है कि राखी का यह पहला त्योहार होगा जब मां-बाप नहीं होंगे। बहन के लिए कई उपहार सोचे। फिर तय किया कि जो उसे पसंद होगा, वही दूंगा।